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‘सीता’ बनने से पहले ही कर दिया था इनकार… फिर कैसे किस्मत ने दीपिका चिक्खलिया को बना दिया अमर?

क्या आप यकीन करेंगे कि जिस चेहरे को आज करोड़ों लोग ‘माता सीता’ के रूप में पूजते हैं, वह शुरुआत में इस किरदार के लिए तैयार ही नहीं थीं? दीपिका चिक्खलिया ने ऑडिशन देने से इनकार कर दिया था। लेकिन फिर एक ऐसा मोड़ आया, जिसने न सिर्फ उनकी किस्मत बदली, बल्कि भारतीय टेलीविजन के इतिहास को भी हमेशा के लिए बदल दिया। यह सिर्फ एक रोल की कहानी नहीं है, बल्कि उस फैसले की कहानी है, जिसने एक साधारण अभिनेत्री को अमर बना दिया।


जब एक ‘ना’ के पीछे छुपा था एक बड़ा मोड़

1980 का दशक… जब टीवी पर हर घर में सिर्फ एक ही चैनल होता था और कहानियां दिलों में उतर जाती थीं। उसी दौर में एक बड़ा सपना आकार ले रहा था – रामानंद सागर की ‘रामायण’। सेट पर कलाकारों की तलाश जारी थी, हर चेहरे को ध्यान से परखा जा रहा था। वहीं दूसरी तरफ, एक युवा लड़की अपने छोटे-छोटे रोल्स के साथ अपने करियर को समझने की कोशिश कर रही थी। दीपिका चिक्खलिया, जो उस समय सिर्फ 18 साल की थीं, ‘विक्रम बेताल’ में काम कर रही थीं। उन्हें यह अंदाजा भी नहीं था कि उसी सेट पर उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा अवसर उनका इंतजार कर रहा है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि वह खुद उस मौके से दूर रहना चाहती थीं। कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा करती है, जहां हम खुद ही अपने भाग्य से नजरें चुरा लेते हैं।


“मुझे ऑडिशन क्यों देना चाहिए?” – एक सवाल, जिसने कहानी बदल दी

जब ‘हरी भाई’ ने उन्हें ‘सीता’ के किरदार के लिए ऑडिशन देने को कहा, तो दीपिका ने इसे बहुत साधारण तरीके से लिया। उनके मन में यह सवाल बार-बार आ रहा था कि जब वह पहले से टीम के साथ काम कर चुकी हैं, तो फिर उन्हें खुद को साबित करने की जरूरत क्यों है। यह सोच एक आम इंसान की तरह ही थी – जहां हम अपने कम्फर्ट जोन में रहना चाहते हैं। लेकिन यही वह पल था, जहां किस्मत ने उन्हें परखा। जब खुद रामानंद सागर ने उनसे कहा, तो उन्होंने मना नहीं कर पाईं। लेकिन यहां भी रास्ता आसान नहीं था। उन्हें चार बार स्क्रीन टेस्ट देना पड़ा। हर बार कैमरे के सामने खड़े होकर उन्होंने खुद को बेहतर बनाया, हर एक्सप्रेशन में निखार लाया। शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि ये चार टेस्ट उनकी पूरी जिंदगी की दिशा तय कर रहे हैं।


कैसे एक अभिनेत्री बन गई ‘आस्था का प्रतीक’

1987 में जब ‘रामायण’ टीवी पर आई, तो यह सिर्फ एक शो नहीं था – यह एक भावना बन गया। लोग अपने काम छोड़कर टीवी के सामने बैठ जाते थे। सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था। और इसी के बीच, दीपिका चिक्खलिया का चेहरा हर घर में ‘सीता माता’ के रूप में बस गया। यह प्रभाव इतना गहरा था कि लोग उन्हें असल जिंदगी में भी देवी की तरह देखने लगे। जब वह कहीं जातीं, लोग उनके पैर छूते, आशीर्वाद लेते, और उनके सामने सिर झुकाते। एक कलाकार के लिए यह सम्मान जितना अद्भुत था, उतना ही जिम्मेदारी भरा भी था। उनका हर कदम, हर शब्द लोगों के लिए मायने रखता था। उन्होंने सिर्फ एक किरदार नहीं निभाया, बल्कि उस किरदार को जिया।


राम और सीता… जो स्क्रीन से उतरकर दिलों में बस गए

अरुण गोविल और दीपिका चिक्खलिया की जोड़ी ने ‘रामायण’ को एक अलग ऊंचाई दी। जब दोनों स्क्रीन पर साथ नजर आते, तो ऐसा लगता मानो हम किसी सीरियल को नहीं, बल्कि एक सजीव इतिहास को देख रहे हैं। उनकी आंखों में सच्चाई, उनके संवादों में भावना, और उनके बीच की समझ… सब कुछ इतना वास्तविक था कि दर्शक खुद को उस कहानी का हिस्सा महसूस करने लगते थे। यही वजह है कि आज भी जब ‘रामायण’ का जिक्र होता है, तो उसी जोड़ी की छवि सबसे पहले सामने आती है। कई कलाकार आए, कई संस्करण बने, लेकिन वह जादू आज भी अटूट है।


फिल्मों से राजनीति तक – एक लंबा और विविध सफर

‘रामायण’ के बाद दीपिका का सफर कई दिशाओं में आगे बढ़ा। उन्होंने फिल्मों में काम किया, जहां उन्होंने राजेश खन्ना जैसे दिग्गज अभिनेता के साथ स्क्रीन शेयर की। ‘घर का चिराग’, ‘रुपये दस करोड़’ जैसी फिल्मों में उनकी मौजूदगी रही। इसके अलावा उन्होंने मलयालम, कन्नड़, तमिल और बंगाली फिल्मों में भी अपनी पहचान बनाई। हर भाषा में उन्होंने अपने अभिनय का अलग रंग दिखाया। हालांकि हिंदी सिनेमा में उन्हें वह सफलता नहीं मिली, जो ‘सीता’ के रूप में मिली थी। लेकिन उन्होंने कभी रुकना नहीं सीखा। आगे चलकर उन्होंने राजनीति में कदम रखा और 1991 में सांसद बनीं। यह बदलाव यह दिखाता है कि उनके भीतर सिर्फ एक कलाकार ही नहीं, बल्कि एक मजबूत व्यक्तित्व भी था।


क्या ‘सीता’ का किरदार बन गया उनकी पहचान या एक परछाई?

यह एक ऐसा सवाल है, जो अक्सर उनके करियर को लेकर उठता है। क्या ‘सीता’ का किरदार उनके लिए वरदान था या एक ऐसी छवि, जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो गया? क्योंकि जहां एक तरफ उन्हें अपार सम्मान मिला, वहीं दूसरी तरफ हर नई भूमिका में उन्हें उसी नजर से देखा गया। लोग उन्हें किसी और किरदार में स्वीकार करने में हिचकिचाते थे। लेकिन अगर गहराई से देखा जाए, तो यही उस किरदार की ताकत थी। उसने उन्हें एक ऐसी पहचान दी, जो समय के साथ और मजबूत होती गई। हर कलाकार का सपना होता है कि उसका काम उसे अमर बना दे – और दीपिका के साथ यही हुआ।


एक फैसला… जिसने इतिहास लिख दिया

सोचिए, अगर उस दिन दीपिका ने ‘ना’ पर ही अड़े रहने का फैसला किया होता, अगर उन्होंने ऑडिशन देने से साफ इनकार कर दिया होता… तो शायद आज ‘सीता’ का चेहरा कोई और होता। लेकिन उन्होंने एक कदम आगे बढ़ाया, एक मौका स्वीकार किया, और वही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बन गया। यह कहानी हमें सिखाती है कि जिंदगी में मिलने वाले हर मौके को हल्के में नहीं लेना चाहिए। क्योंकि कई बार वही छोटे-छोटे फैसले हमें वहां पहुंचा देते हैं, जहां हम खुद भी नहीं सोचते।


आज भी वैसी ही ताजगी, वैसी ही श्रद्धा

आज जब ‘रामायण’ फिर से टीवी पर आती है या सोशल मीडिया पर उसके क्लिप्स वायरल होते हैं, तो वही भावनाएं दोबारा जाग जाती हैं। दीपिका चिक्खलिया की मुस्कान, उनकी सादगी, उनकी आंखों की मासूमियत… सब कुछ वैसा ही महसूस होता है। यह सिर्फ एक याद नहीं है, बल्कि एक ऐसा अनुभव है, जो हर पीढ़ी को जोड़ता है। OldisGoldFilms की यही खासियत है कि वह हमें उन पलों में वापस ले जाती है, जहां कहानियां सिर्फ देखी नहीं जाती थीं, बल्कि महसूस की जाती थीं।


जन्मदिन की शुभकामनाएं – एक अमर ‘सीता’ को

आज के दिन, जब हम दीपिका चिक्खलिया का जन्मदिन मना रहे हैं, तो यह सिर्फ एक अभिनेत्री का जन्मदिन नहीं है, बल्कि उस किरदार का उत्सव है, जिसने करोड़ों दिलों में अपनी जगह बनाई। हम उन्हें दिल से शुभकामनाएं देते हैं कि वह हमेशा स्वस्थ रहें, खुश रहें और यूं ही अपनी सादगी और गरिमा से लोगों को प्रेरित करती रहें।
Happy Birthday to the eternal ‘Sita’ – आपकी छवि हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेगी।


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