पंडित किशन महाराज: कृष्ण जन्माष्टमी की रात जन्मा वह कलाकार, जिसने तबले को दिलाई नई पहचान
Pandit Kishan Maharaj Story The Tabla Maestro Who Transformed Indian Classical Music

कभी-कभी किसी कलाकार का जन्म सिर्फ एक तारीख नहीं होता। वह अपने साथ एक पूरी परंपरा लेकर आता है। काशी की धरती पर जन्मे पंडित किशन महाराज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कृष्ण जन्माष्टमी की आधी रात जब दुनिया भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मना रही थी, उसी समय वाराणसी के कबीरचौरा मोहल्ले में एक बच्चे ने जन्म लिया। परिवार ने उसका नाम रखा किशन। शायद तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही बच्चा आगे चलकर तबले की दुनिया में ऐसा नाम बनेगा, जिसे सुनते ही बनारस घराने की ठसक, गहराई और लय याद आने लगेगी। यही बालक आगे चलकर पंडित किशन महाराज कहलाया। उन्होंने तबले को केवल बजाया नहीं, बल्कि उसकी भाषा को मंच पर एक स्वतंत्र पहचान दी। 3 सितंबर 1923 से 4 मई 2008 तक फैली उनकी जीवन यात्रा संगीत साधना, अनुशासन, जुनून और विलक्षण व्यक्तित्व की कहानी है।
लेकिन आखिर तबले की थाप में ऐसा क्या था, जिसने उन्हें सबसे अलग बना दिया?
किशन महाराज का जन्म किसी साधारण परिवार में नहीं हुआ था। उनका घर संगीत की परंपरा से जुड़ा था। उनके पिता पंडित हरि महाराज शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता थे। इसलिए संगीत उनके लिए कोई बाहरी विषय नहीं था। वह उनके घर की सांसों में शामिल था। बचपन से ही उन्हें शास्त्रीय संगीत की शिक्षा मिलने लगी। पिता के निधन के बाद उनकी शिक्षा की जिम्मेदारी उनके चाचा और महान गुरु पंडित कंठे महाराज ने संभाली। यहीं से किशन महाराज की असली साधना शुरू हुई। उन्हें केवल तबला नहीं सिखाया गया। गायन, नृत्य और वादन की बारीकियां भी समझाई गईं। शायद यही कारण था कि उनकी संगत में केवल ताल नहीं सुनाई देती थी। उसमें गायक का भाव और नर्तक की गति भी महसूस होती थी। उनके लिए तबला हाथों का खेल नहीं था। वह भाव, गणित, अनुशासन और आत्मा का मेल था।
एक ऐसा दौर, जब तबला पीछे बैठता था
आज किसी बड़े शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम में तबले का एकल वादन सामान्य बात लगती है। मगर एक समय ऐसा भी था, जब तबला मुख्य कलाकार के पीछे बैठकर केवल संगत करने वाला वाद्य माना जाता था। किशन महाराज ने इसी सोच को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने तबले की थाप को इतना प्रभावशाली बनाया कि श्रोता केवल मुख्य कलाकार को सुनने नहीं आते थे। तबले की अपनी प्रस्तुति भी उनके लिए आकर्षण बन गई। उनकी उंगलियां जब दायां और बायां तबला साधती थीं, तो लय जैसे उनके आदेश पर चलने लगती थी। यही वह परिवर्तन था, जिसने तबले को संगत से उठाकर एकल वादन के केंद्र में पहुंचाया। बनारस घराने की ताकत उनके व्यक्तित्व से जुड़ गई। आने वाली पीढ़ियों ने भी इसी स्वतंत्र पहचान को आगे बढ़ाया।
जिन दिग्गजों के साथ बैठना ही सम्मान था, उनके साथ किशन महाराज ने संगत की
उनके संगीत जीवन की विशालता का अंदाजा केवल पुरस्कारों से नहीं लगाया जा सकता। उनकी असली पहचान उन महान कलाकारों के साथ दिखाई देती है, जिनके साथ उन्होंने मंच साझा किया। पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, उस्ताद फैयाज खान, पंडित भीमसेन जोशी, पंडित रविशंकर और उस्ताद अली अकबर खान जैसे महान कलाकारों के साथ उनकी संगत हुई। नृत्य की दुनिया में भी उनकी थाप की अलग पहचान थी। पंडित शंभू महाराज, सितारा देवी, गोपी कृष्ण और पंडित बिरजू महाराज जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियों में उन्होंने तबले से भावों को सहारा दिया। विदेशों में भी उनकी कला पहुंची। एडिनबर्ग और 1965 के ब्रिटेन कॉमनवेल्थ कला समारोह जैसे मंचों पर उनकी प्रस्तुतियों ने भारतीय ताल परंपरा की प्रतिष्ठा बढ़ाई।
मंच पर तबला खराब हो जाए, तो घबराते थे बाकी लोग; किशन महाराज नहीं
उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए उनकी कुछ घटनाएं किसी डॉक्यूमेंट्री से कम नहीं हैं। एक बार अहमदाबाद में एक बड़े कार्यक्रम की तैयारी चल रही थी। उनके साथ पंडित बिरजू महाराज और राजन-साजन मिश्र भी प्रस्तुति देने वाले थे। सभागार पूरी तरह भर चुका था। इसी बीच ग्रीन रूम में तबले की बध्धी टूट गई। कलाकारों के लिए यह बेहद तनावपूर्ण स्थिति हो सकती थी। मगर किशन महाराज के चेहरे पर चिंता नहीं आई। उन्होंने खुद तबला उठाया। बध्धी खोली और उसे अपने पैर में फंसाकर कसने लगे। कुछ ही देर में तबला फिर तैयार था। उनका आत्मविश्वास ऐसा था कि उन्होंने साफ कहा कि चमड़ा शायद फट जाए, लेकिन बध्धी नहीं टूटेगी। यही उनका स्वभाव था। समस्या चाहे कितनी भी छोटी या बड़ी हो, समाधान सामने होना चाहिए।
हारमोनियम में पेंच ढीला हुआ, तो उस्ताद ने तीली से उसे ठीक कर दिया
उनकी यही आदत केवल तबले तक सीमित नहीं थी। एक बार राजन मिश्रा हारमोनियम बजा रहे थे। उसका एक स्टॉपर निकल गया। किशन महाराज ने हारमोनियम को उलट-पलटकर देखा। फिर अपने बनारसी अंदाज में तीली मंगाई। पेंच का छेद बड़ा हो गया था। उन्होंने तीली लगाकर पेंच कस दिया। उनके लिए चीजों को समझना और ठीक करना भी एक कला थी। घड़ी का कोई पुर्जा हो या तबले का हिस्सा, वह उसे खोलकर समझने में रुचि रखते थे। फिर उसे वापस जोड़ते थे। यही बारीकी उनके तबला मिलाने में भी दिखाई देती थी। वह तबले को मंच पर बैठने से पहले इतनी सावधानी से मिलाते थे कि प्रस्तुति के दौरान दोबारा हथौड़ा उठाने की जरूरत नहीं पड़ती थी।
दो-दो घंटे सिर्फ तबला मिलाना भी उनकी साधना का हिस्सा था
आज तेज प्रस्तुति और मंचीय चमक को देखकर लगता है कि कलाकार की सफलता केवल प्रदर्शन में है। किशन महाराज की जिंदगी इसके बिल्कुल उलट थी। उनके लिए तैयारी ही प्रदर्शन का सबसे बड़ा आधार थी। उनके परिवार के अनुसार, उनके पिता ने उन्हें तबला मिलाने में घंटों लगाए। कभी-कभी दो-दो घंटे केवल तबले की सही ध्वनि निकालने में बीतते थे। यही अभ्यास आगे चलकर उनकी पहचान बना। एक बार पंडित रविशंकर के साथ ग्वालियर में उन्होंने लगभग 12 घंटे तक तबला बजाया। इतनी लंबी प्रस्तुति केवल शारीरिक क्षमता से संभव नहीं होती। उसके पीछे वर्षों की साधना और लय पर असाधारण नियंत्रण चाहिए।
काशी के इस कलाकार की दिनचर्या भी किसी तपस्या से कम नहीं थी
पंडित किशन महाराज का जीवन केवल मंच पर नहीं बनता था। उनका असली संसार रियाज से शुरू होता था। सुबह उठकर वह अभ्यास करते थे। इसके बाद स्नान और ध्यान होता था। फिर वह साइकिल से संकट मोचन मंदिर जाते थे। वहां मत्था टेकना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। दोस्तों से मिलना, बनारसी अंदाज में पान खाना और फिर घर लौटकर रियाज करना भी उनके जीवन का सहज हिस्सा था। भोजन के बाद विश्राम होता था। उनका जीवन दिखाता है कि महान कलाकारों की चमक के पीछे अक्सर बेहद साधारण दिनचर्या छिपी होती है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि उस साधारण दिनचर्या में असाधारण अनुशासन शामिल होता है।
तबला ही नहीं, कविता और चित्रकला में भी बसते थे किशन महाराज
किशन महाराज का व्यक्तित्व केवल संगीत तक सीमित नहीं था। वह चित्र बनाते थे। वीर रस के कवि भी थे। वर्ष 1947 में उन्होंने ‘तिरंगा’ जैसी रचना लिखी। रामायण से जुड़े प्रसंगों को बंदिशों का रूप देने में भी उनकी रुचि थी। बचपन में वह पंडित शंभू महाराज के यहां होने वाली शेरो-शायरी की महफिलों में जाते थे। वहां एक मिसरा दिया जाता था और कलाकार उसी आधार पर रचना तैयार करते थे। एक बार उन्हें ‘तकिया लागी’ से रचना बनाने का अवसर मिला। उन्होंने रातभर में ऐसी रचना तैयार की कि सुनने वाले प्रभावित हुए। उनके भीतर कलाकार केवल तबले पर नहीं बैठता था। वह शब्दों, रंगों और भावों में भी दिखाई देता था।
कुश्ती, पतंग, पान और मिठाई — यह तबला सम्राट इतना रंगीन इंसान भी था
किशन महाराज की जिंदगी का एक और पहलू बेहद दिलचस्प था। वह कुश्ती के शौकीन थे। सिर पर दुपलिया टोपी लगाकर इक्के पर निकलना उन्हें पसंद था। पतंगबाजी का शौक भी कम नहीं था। वह कोलकाता से ट्रंक भरकर पतंगें लेकर आते थे। कुत्ते पालने का भी उन्हें विशेष शौक था। पानदान सजाने में भी उनकी अपनी शैली थी। कपड़े वह इतनी सफाई से तह करते थे कि वे दोबारा प्रेस किए हुए लगते थे। मिठाइयों से उनका प्रेम भी मशहूर था। हालांकि भोजन कम करने की सलाह देते हुए वह अक्सर कहते थे, “कम खाना, गम खाना।” यह बनारसी ठसक उनके व्यक्तित्व को और खास बनाती थी।
डायरी के पन्नों में शायद एक पूरा युग कैद था
उनकी स्मरण शक्ति असाधारण बताई जाती थी। वर्षों पुरानी घटनाओं को भी वह सिलसिलेवार याद रखते थे। उन्हें डायरी लिखने का भी शौक था। उनके करीबी मानते थे कि अगर उन डायरी के पन्नों को पूरी तरह पढ़ा जाए, तो उसमें एक पूरा संगीत इतिहास दिखाई दे सकता है। कलाकारों से मुलाकातें, यात्राएं, प्रस्तुतियां और जीवन के अनुभव शायद उन पन्नों में दर्ज रहे। यही छोटी-छोटी आदतें किसी कलाकार को केवल कलाकार नहीं रहने देतीं। वह अपने समय का दस्तावेज बन जाता है।
उनके लिए कलाकार बनाना भी ईश्वर के हाथ में था
पंडित किशन महाराज की विनम्रता का एक प्रसंग उनके व्यक्तित्व को बहुत गहराई से समझाता है। एक बार अहमदाबाद में वह अचानक अपने कमरे से बाहर आए। चेहरे पर शेविंग क्रीम लगी थी। उन्होंने अपने भांजे साजन मिश्रा को आवाज दी। फिर उन्होंने एक ऐसी बात कही, जो उनकी सोच का परिचय देती है। उनका भाव था कि उन्हें कभी लगता था कि वह किसी को कलाकार बना सकते हैं। मगर समय ने उन्हें सिखाया कि कलाकार बनाने वाला वास्तव में ऊपर बैठा करतार है। इंसान केवल प्रतिभा को निखार सकता है। यह बात उस व्यक्ति की विनम्रता दिखाती है, जिसने खुद संगीत की दुनिया में असाधारण ऊंचाई हासिल की थी।
जिन शिष्यों ने उनकी थाप आगे बढ़ाई, वही उनकी असली विरासत हैं
किशन महाराज की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल उनके पुरस्कार नहीं थे। उनकी असली विरासत उनके शिष्य और आने वाली पीढ़ियां हैं। पंडित कुमार बोस, पंडित बालकृष्ण अय्यर और सुखविंदर सिंह नामधारी जैसे कलाकारों ने उनसे शिक्षा पाई। परिवार में भी उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया गया। नई पीढ़ी के कलाकारों ने उनके रियाज, अनुशासन और बनारसी शैली को अपनाया। यही किसी गुरु की सबसे बड़ी सफलता होती है। जब उसकी थाप उसके जाने के बाद भी किसी दूसरे कलाकार की उंगलियों से सुनाई दे, तब समझिए कि कलाकार सचमुच अमर हो चुका है।
पुरस्कार बहुत मिले, लेकिन पहचान किसी सम्मान से बड़ी थी
पंडित किशन महाराज को उनके योगदान के लिए अनेक सम्मान मिले। वर्ष 1973 में उन्हें पद्मश्री प्रदान किया गया। 1984 में केंद्रीय संगीत नाटक पुरस्कार मिला। इसके अलावा उस्ताद इनायत अली खान पुरस्कार, दीनानाथ मंगेशकर पुरस्कार, उत्तर प्रदेश रत्न, उत्तर प्रदेश गौरव, भोजपुरी रत्न, भागीरथ सम्मान और लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान जैसे कई सम्मान उनके नाम जुड़े। वर्ष 2002 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्म विभूषण पाने वाले प्रमुख तबला कलाकारों में विशेष स्थान प्राप्त हुआ। मगर सच यह है कि उनका सबसे बड़ा पुरस्कार वह बदलाव था, जो उन्होंने तबले की प्रतिष्ठा में पैदा किया।
4 मई 2008 को थमी सांस, लेकिन नहीं थमी वह थाप
4 मई 2008 को पंडित किशन महाराज इस दुनिया से विदा हो गए। मगर उनकी विदाई के साथ उनकी कला समाप्त नहीं हुई। काशी की गलियों में आज भी उनकी स्मृतियां जीवित हैं। बनारस घराने के तबले में आज भी उनकी परंपरा सुनाई देती है। उनके शिष्य और परिवार की अगली पीढ़ियां उनकी विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। जब कोई युवा कलाकार तबले के सामने बैठकर घंटों रियाज करता है, तो कहीं न कहीं उस साधना में किशन महाराज की छाया दिखाई देती है।
आखिर पंडित किशन महाराज को याद करना आज भी जरूरी क्यों है?
किशन महाराज की कहानी केवल एक महान तबला वादक की कहानी नहीं है। यह उस कलाकार की कहानी है, जिसने परंपरा को सम्मान दिया और उसी परंपरा में नया रास्ता बनाया। उन्होंने बताया कि कोई वाद्य छोटा या बड़ा नहीं होता। उसे बजाने वाला कलाकार उसकी प्रतिष्ठा तय करता है। उन्होंने तबले को पीछे बैठने वाला वाद्य नहीं रहने दिया। उसकी थाप को सामने लाकर खड़ा किया। उनके जीवन में संगीत था। मगर उसके साथ अनुशासन, जिज्ञासा, विनम्रता और बनारसी जीवन का रंग भी था। शायद इसलिए पंडित किशन महाराज को केवल याद नहीं किया जाता। उन्हें सुना जाता है। उनकी थाप को महसूस किया जाता है। और जब तक तबले की कोई उंगली बनारस की उस परंपरा को आगे बढ़ाती रहेगी, तब तक काशी के इस तबला मार्तंड की कहानी खत्म नहीं होगी।
Old is Gold Films के लिए पंडित किशन महाराज की यह कहानी उस भारत की याद है, जहां कला केवल मंच पर नहीं होती थी। वह कलाकार की पूरी जिंदगी में सांस लेती थी।