September 14, 2026

जिस लेखक ने आज़ादी की लड़ाई भी लड़ी और मराठी साहित्य भी बदल दिया… लेकिन इतिहास ने भुला दिया

The Forgotten Freedom Fighter Who Revolutionized Marathi Literature

The Forgotten Freedom Fighter Who Revolutionized Marathi Literature

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल तलवार उठाने वाले वीरों की कहानी नहीं है। इस इतिहास में ऐसे भी योद्धा हुए जिन्होंने बंदूक नहीं, बल्कि अपनी कलम को हथियार बनाया। जिनके शब्दों ने समाज को सोचने पर मजबूर किया, युवाओं को जागृत किया और आने वाली पीढ़ियों को संस्कृति, इतिहास और राष्ट्रभक्ति का मार्ग दिखाया। ऐसे ही विलक्षण व्यक्तित्व थे नारायण हरी आपटे, जिन्हें पूरा महाराष्ट्र प्रेम से नानासाहेब आपटे के नाम से जानता है।

11 जुलाई 1889 को जन्मे नानासाहेब आपटे केवल एक उपन्यासकार नहीं थे। वे स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, प्रकाशक, संपादक, पटकथा लेखक, समाज सुधारक और सांस्कृतिक चिंतक भी थे। उन्होंने अपने जीवन में साहित्य, पत्रकारिता, प्रकाशन, सिनेमा और राष्ट्रसेवा—हर क्षेत्र में ऐसी छाप छोड़ी, जिसकी चर्चा आज भी मराठी साहित्य के इतिहास में बड़े सम्मान के साथ की जाती है। लेकिन अफसोस यह है कि देशभर में उनके योगदान से बहुत कम लोग परिचित हैं।


15 साल की उम्र… और ऐसा फैसला जिसने पूरी जिंदगी बदल दी

कल्पना कीजिए, एक किशोर जिसकी उम्र केवल पंद्रह वर्ष हो। उस उम्र में अधिकांश बच्चे अपनी पढ़ाई, खेल और भविष्य के सपनों में खोए रहते हैं। लेकिन नानासाहेब आपटे ने उस उम्र में ऐसा निर्णय लिया जिसने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी।

सांगली जिले के सामडोली गांव में जन्मे नानासाहेब ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सामडोली और सतारा में प्राप्त की। आगे की पढ़ाई के लिए वे सतारा के न्यू इंग्लिश स्कूल पहुंचे। इसी दौरान देश में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की लहर तेज हो रही थी। युवा विनायक दामोदर सावरकर के विचारों ने हजारों युवाओं की तरह नानासाहेब के मन को भी झकझोर दिया।

साल 1904-05 के आसपास उन्होंने घर छोड़ दिया और सावरकर द्वारा स्थापित अभिनव भारत संगठन से जुड़ गए। यह केवल संगठन में शामिल होना नहीं था, बल्कि अपने जीवन को राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित करने की प्रतिज्ञा थी। यही वह दौर था जब उनके भीतर का लेखक और क्रांतिकारी एक साथ जन्म ले रहा था।


एक लेखक बनने से पहले उन्होंने पूरे भारत को पढ़ा

नानासाहेब आपटे की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने केवल किताबें नहीं पढ़ीं, बल्कि पूरे भारत को पढ़ा। वे उत्तर भारत, राजस्थान, बंगाल (विभाजन से पहले), नेपाल और अनेक क्षेत्रों की लंबी यात्राओं पर निकले। इन यात्राओं ने उनकी सोच को व्यापक बनाया।

यात्राओं के दौरान उन्होंने केवल नए स्थान नहीं देखे बल्कि हिंदी, बंगाली, गुजराती, नेपाली और अंग्रेज़ी जैसी कई भाषाओं का भी गहरा ज्ञान प्राप्त किया। अलग-अलग संस्कृतियों, रीति-रिवाजों और समाज की समस्याओं को उन्होंने बेहद करीब से देखा।

जयपुर में उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी अर्जुनलाल सेठी द्वारा संचालित विद्यालय में अध्यापन भी किया। शिक्षक के रूप में यह अनुभव उनके व्यक्तित्व को और अधिक परिपक्व बना गया। यही कारण है कि बाद में उनके उपन्यासों में केवल कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविक भारतीय समाज की झलक दिखाई देती है।


इतिहास की धूल में छिपे दस्तावेज़ों को नई ज़िंदगी देने वाला लेखक

1913 में नानासाहेब आपटे सतारा लौटे। यहां उनकी मुलाकात प्रसिद्ध इतिहासकार दत्तात्रेय बळवंत पारसनीस से हुई। यह मुलाकात उनके साहित्यिक जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई।

उस समय मराठी इतिहास के अनेक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ मोदी लिपि में उपलब्ध थे, जिन्हें पढ़ना और समझना हर किसी के बस की बात नहीं थी। नानासाहेब ने इन ऐतिहासिक दस्तावेज़ों का अनुवाद मानक मराठी और अंग्रेज़ी में करने का कठिन कार्य संभाला।

इस काम ने उन्हें मराठा इतिहास की गहराई से परिचित कराया। यही कारण है कि उनके ऐतिहासिक उपन्यासों में केवल कहानी नहीं, बल्कि शोध, प्रमाण और इतिहास की सजीवता दिखाई देती है। वे इतिहास को केवल घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि समाज की आत्मा के रूप में देखते थे।


जब साहित्य उनके लिए केवल मनोरंजन नहीं, समाज परिवर्तन का माध्यम बना

नानासाहेब आपटे उन लेखकों में नहीं थे जो केवल लोकप्रियता के लिए लिखते हैं। उनके लिए साहित्य समाज को दिशा देने का माध्यम था।

उनकी कहानियों में मराठी मध्यमवर्गीय परिवारों का जीवन, सामाजिक संघर्ष, पारिवारिक रिश्ते, नैतिक मूल्य, इतिहास, राष्ट्रभक्ति और भारतीय संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है। उन्होंने सामाजिक उपन्यास, ऐतिहासिक उपन्यास, प्रेरणादायक साहित्य और पारिवारिक जीवन पर सलाह देने वाली अनेक पुस्तकें लिखीं।

उनकी पहली कहानी प्रसिद्ध पत्रिका ‘करमणूक’ में प्रकाशित हुई, जिसके संपादक स्वयं प्रसिद्ध साहित्यकार हरिनारायण आपटे थे। वर्ष 1909 में उनका पहला उपन्यास ‘अजिंक्यतारा’ प्रकाशित हुआ, जिसने उन्हें मराठी साहित्य में नई पहचान दिलाई।

इसके बाद उन्होंने तीन दशक नहीं, बल्कि आधी सदी से अधिक समय तक लगातार लेखन किया। उनकी अंतिम प्रमुख कृति ‘जवानांचा जीवनधर्म’ वर्ष 1962 में प्रकाशित हुई। यह उनकी लेखकीय यात्रा की लंबी और प्रेरणादायक कहानी का अंतिम अध्याय था।


35 से अधिक उपन्यास… लेकिन उनका मिशन सिर्फ किताबें बेचना नहीं था

आज के समय में लेखक अपनी किताब प्रकाशित कराने के लिए प्रकाशकों के पीछे दौड़ते हैं। लेकिन नानासाहेब आपटे ने इसका उल्टा रास्ता चुना।

उन्होंने 1913 में अजिंक्यतारा पुस्तकालय की स्थापना की। इसके बाद 1915 में साहित्यिक एवं राजनीतिक पत्रिका ‘आल्हाद’ शुरू की और आगे चलकर ‘मधुकर’ नामक पत्रिका का भी प्रकाशन किया।

1920 में उन्होंने अपना स्वयं का श्रीनिवास मुद्रणालय स्थापित किया और 1924 में Apte & Co. नामक प्रकाशन संस्था की शुरुआत की।

यह केवल एक व्यवसाय नहीं था। उनका उद्देश्य था अच्छे साहित्य को समाज तक पहुंचाना। उन्होंने मराठी प्रकाशन जगत को नई दिशा दी और अनेक लेखकों के लिए मंच तैयार किया।


1942 का वह फैसला जिसने सबको चौंका दिया

1932 में नानासाहेब आपटे की मुलाकात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से हुई। वे संघ से जुड़े भी।

लेकिन इतिहास का सबसे रोचक पहलू यह है कि जब 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ, तब संघ ने आधिकारिक रूप से इस आंदोलन में भाग नहीं लिया। इसके बावजूद नानासाहेब आपटे ने व्यक्तिगत रूप से इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की।

यह निर्णय बताता है कि उनके लिए सबसे बड़ा धर्म राष्ट्र था। वे किसी संगठन की सीमाओं से ऊपर उठकर भारत की स्वतंत्रता को सर्वोच्च मानते थे। यही कारण है कि उनका जीवन विचारों की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत नैतिक साहस का उदाहरण बन गया।


जब मराठी फिल्मों को मिला एक महान कथाकार

बहुत कम लोग जानते हैं कि नानासाहेब आपटे ने मराठी सिनेमा को भी समृद्ध किया।

1922 में महान फिल्मकार बाबूराव पेंटर उन्हें फिल्म जगत में लेकर आए। उन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों को फिल्मों की पटकथा में रूपांतरित करना शुरू किया।

बाद में उनका जुड़ाव प्रभात फिल्म कंपनी और महान निर्देशक वि. शांताराम के साथ हुआ। उन्होंने दत्ता धर्माधिकारी, शांताराम आठवले और दिनकर पाटिल जैसे निर्देशकों के साथ भी काम किया।

उनकी साहित्यिक समझ ने मराठी फिल्मों को मजबूत कथानक दिए। उस दौर में जब भारतीय सिनेमा अपनी पहचान बना रहा था, नानासाहेब आपटे जैसे लेखक उसकी मजबूत नींव तैयार कर रहे थे।


जब दादासाहेब फाल्के के कठिन समय में उन्होंने बढ़ाया मदद का हाथ

इतिहास केवल उपलब्धियों का नहीं, इंसानियत का भी होता है।

भारतीय सिनेमा के जनक दादासाहेब फाल्के जब अपने जीवन के कठिन दौर से गुजर रहे थे, तब नानासाहेब आपटे ने उनका साथ नहीं छोड़ा। फाल्के लगभग एक वर्ष तक कोरेगांव स्थित आपटे परिवार के घर में रहे।

यह घटना बताती है कि नानासाहेब केवल बड़े लेखक ही नहीं, बल्कि बड़े इंसान भी थे। उन्होंने संघर्ष कर रहे कलाकारों की हरसंभव सहायता की और उनका घर कई प्रतिभाशाली लोगों के लिए आश्रय बन गया।


उनके उपन्यास आज भी क्यों पढ़े जाते हैं?

नानासाहेब आपटे ने लगभग 35 से अधिक उपन्यास लिखे। इनमें अजिंक्यतारा, पहाटेपूर्वीचा काळोख, भाग्यश्री, हृदयाची श्रीमंती, मानवी आशा, न पटणारी गोष्ट, पाच ते पाच, राजपुताचे भीष्म, वेटिंग रूम, एकटी, पंजाबचा लढवय्या सीख और जवानांचा जीवनधर्म जैसी अनेक चर्चित कृतियाँ शामिल हैं।

इन रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें मनोरंजन के साथ-साथ जीवन दर्शन भी मिलता है। उनके पात्र साधारण लोग हैं, लेकिन उनके संघर्ष असाधारण हैं। यही कारण है कि दशकों बाद भी उनके उपन्यास प्रासंगिक महसूस होते हैं।


80वां जन्मदिन… और साहित्य जगत का अभूतपूर्व सम्मान

जब नानासाहेब आपटे ने अपने जीवन के 80 वर्ष पूरे किए, तब कोरेगांव में उनका सम्मान समारोह आयोजित किया गया। पुणे से अनेक प्रसिद्ध कवि, लेखक और साहित्यकार उन्हें सम्मान देने पहुंचे।

यह सम्मान केवल उनकी उम्र का नहीं था। यह उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता थी जिसने पूरी जिंदगी साहित्य, समाज और राष्ट्र को समर्पित कर दी थी।


आज भी जिंदा है नानासाहेब आपटे की विरासत

14 नवंबर 1971 को नानासाहेब आपटे इस दुनिया से विदा हो गए। लेकिन उनकी कलम आज भी जीवित है।

उन्होंने यह साबित किया कि लेखक केवल कहानीकार नहीं होता। वह समाज का मार्गदर्शक, इतिहास का संरक्षक, संस्कृति का प्रहरी और आने वाली पीढ़ियों का शिक्षक भी होता है।

आज जब साहित्य और मनोरंजन तेजी से बदल रहे हैं, तब नानासाहेब आपटे का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्ची लेखनी वही होती है जो समाज को सोचने पर मजबूर करे, इतिहास को जीवित रखे और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव जगाए।

उनका जीवन एक प्रेरणा है कि शब्दों की शक्ति किसी भी तलवार से कम नहीं होती। शायद यही कारण है कि महाराष्ट्र उन्हें केवल एक लेखक के रूप में नहीं, बल्कि साहित्य, राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक चेतना के अमर प्रतीक के रूप में याद करता है।

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