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दुनिया को परमाणु तबाही से बचाने वाली भारतीय महिला। कौन थीं विजयलक्ष्मी पंडित। जिन्हें दुनिया कहती थी भारत की पहली “आयरन लेडी”।

दुनिया को परमाणु तबाही से बचाने वाली भारतीय महिला। कौन थीं विजयलक्ष्मी पंडित। जिन्हें दुनिया कहती थी भारत की पहली “आयरन लेडी”।
दुनिया को परमाणु तबाही से बचाने वाली भारतीय महिला। कौन थीं विजयलक्ष्मी पंडित। जिन्हें दुनिया कहती थी भारत की पहली “आयरन लेडी”।

जब दुनिया पुरुष नेताओं से चलती थी। तब एक भारतीय महिला संयुक्त राष्ट्र में सबको चुप करा देती थी।

भारत के इतिहास में कई ऐसे चेहरे खो गए। जिनकी कहानियां नई पीढ़ी तक पहुंच ही नहीं पाईं। लेकिन कुछ नाम समय से बड़े हो जाते हैं। ऐसा ही एक नाम था विजयलक्ष्मी पंडित का। लोग उन्हें सिर्फ पंडित नेहरू की बहन मानते रहे। मगर उनकी असली पहचान इससे कहीं आगे थी। वह उस दौर की महिला थीं। जब राजनीति पुरुषों के कब्जे में थी। दुनिया युद्धों से जल रही थी। अमेरिका और रूस आमने-सामने खड़े थे। हर दिन तीसरे विश्व युद्ध का डर बढ़ रहा था। उसी समय भारत की एक महिला दुनिया को शांति का रास्ता समझा रही थी। उनकी आवाज में सादगी थी। लेकिन शब्दों में ताकत थी। यही वजह रही कि दुनिया उन्हें सिर्फ राजनयिक नहीं मानती थी। उन्हें भारत की सबसे प्रभावशाली महिला नेताओं में गिना जाता था। OLDISGOLDFILMS आज भी उनकी कहानी को इतिहास का सबसे प्रेरणादायक अध्याय मानता है।

आनंद भवन में जन्मी वह लड़की। जिसकी आंखों में बचपन से नेतृत्व था।

18 अगस्त 1900 का दिन था। इलाहाबाद का आनंद भवन राजनीतिक चर्चाओं से भरा रहता था। उसी घर में मोतीलाल नेहरू की बेटी स्वरूप कुमारी ने जन्म लिया। आगे चलकर वही लड़की विजयलक्ष्मी पंडित बनी। घर में अंग्रेजी संस्कृति थी। आलीशान जीवन था। बड़े शिक्षक पढ़ाने आते थे। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उन्होंने कभी कॉलेज की डिग्री नहीं ली। वह सिर्फ 12वीं तक पढ़ी थीं। फिर भी उनकी अंग्रेजी इतनी प्रभावशाली थी कि विदेशी नेता भी चौंक जाते थे। उस समय महिलाएं पर्दे में रखी जाती थीं। उन्हें राजनीति से दूर रखा जाता था। मगर विजयलक्ष्मी अलग थीं। उनकी सोच बाकी लड़कियों जैसी नहीं थी। वह सवाल पूछती थीं। राजनीतिक चर्चाएं सुनती थीं। बड़े नेताओं को समझने की कोशिश करती थीं। शायद तभी उनके अंदर नेतृत्व धीरे-धीरे जन्म ले रहा था।

गांधीजी की एक अपील ने बदल दी थी उनकी पूरी जिंदगी।

1921 में उनकी शादी रंजीत सीताराम पंडित से हुई। रंजीत बेहद पढ़े-लिखे बैरिस्टर थे। दोनों आरामदायक जीवन जी सकते थे। लेकिन उसी समय महात्मा गांधी का आंदोलन तेज हो गया। गांधीजी ने विदेशी कपड़े छोड़ने की अपील की। विजयलक्ष्मी ने उसी दिन रेशमी कपड़े त्याग दिए। उन्होंने खादी पहनना शुरू किया। महलों का जीवन छोड़ दिया। वह सड़कों पर उतर आईं। धीरे-धीरे उनका जीवन स्वतंत्रता आंदोलन में डूब गया। उन्होंने सभाएं कीं। महिलाओं को जागरूक किया। अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई। 1932 में उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया। इसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया। उस समय महिलाओं का जेल जाना समाज के लिए चौंकाने वाली बात थी। मगर विजयलक्ष्मी डरने वालों में नहीं थीं। उनके अंदर देशभक्ति आग की तरह जल रही थी। वह समझ चुकी थीं कि आजादी बिना संघर्ष नहीं मिलेगी।

पति की मौत ने उन्हें तोड़ा नहीं। बल्कि और मजबूत बना दिया।

ब्रिटिश सरकार ने उनके पति रंजीत पंडित को जेल में डाल दिया। जेल की हालत बेहद खराब थी। वहां उनका स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया। आखिरकार 1944 में उनका निधन हो गया। यह विजयलक्ष्मी की जिंदगी का सबसे दर्दनाक समय था। अचानक वह अकेली पड़ गईं। ऊपर से उस समय के हिंदू कानून विधवाओं को संपत्ति का अधिकार भी नहीं देते थे। आर्थिक संकट सामने खड़ा था। कोई भी महिला शायद टूट जाती। मगर विजयलक्ष्मी ने हार नहीं मानी। उन्होंने किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। अपने दर्द को ताकत बना लिया। यही वह समय था। जब उन्होंने खुद को पूरी तरह सार्वजनिक जीवन में झोंक दिया। उन्होंने साबित किया कि जिंदगी इंसान को गिराती जरूर है। लेकिन वही गिरावट इंसान को सबसे मजबूत भी बनाती है।

जब भारत को मिली पहली महिला कैबिनेट मंत्री।

1937 का साल भारतीय राजनीति के लिए ऐतिहासिक बन गया। ब्रिटिश शासन के दौरान चुनाव हुए। विजयलक्ष्मी संयुक्त प्रांत विधानसभा के लिए चुनी गईं। इसके बाद उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। वह भारत की पहली महिला कैबिनेट मंत्री बनीं। उस समय महिलाओं का राजनीति में आना भी असामान्य माना जाता था। मगर विजयलक्ष्मी हर मंच पर अपनी क्षमता साबित कर रही थीं। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की बात की। महिलाओं के अधिकारों को लेकर खुलकर बोलीं। लोग समझने लगे थे कि वह सिर्फ नेहरू परिवार का हिस्सा नहीं हैं। वह खुद एक मजबूत नेता हैं। धीरे-धीरे उनका नाम अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचने लगा। विदेशी पत्रकार भी अब भारत की इस महिला नेता के बारे में लिखने लगे थे।

रूस और अमेरिका के बीच भारत की सबसे मजबूत आवाज बनी थीं विजयलक्ष्मी।

आजादी के बाद दुनिया दो हिस्सों में बंट चुकी थी। एक तरफ अमेरिका था। दूसरी तरफ सोवियत संघ। दोनों देशों के बीच कोल्ड वॉर चल रही थी। हर दिन युद्ध का खतरा बढ़ रहा था। ऐसे समय भारत को एक मजबूत राजनयिक चेहरे की जरूरत थी। पंडित नेहरू ने अपनी बहन विजयलक्ष्मी पर भरोसा जताया। उन्हें सोवियत संघ में भारत का राजदूत बनाया गया। यह जिम्मेदारी बेहद कठिन थी। लेकिन विजयलक्ष्मी ने अपनी समझदारी से सबको प्रभावित कर दिया। बाद में उन्हें अमेरिका भेजा गया। वाशिंगटन में उनकी साड़ी चर्चा का विषय बन गई। विदेशी मीडिया उनके आत्मविश्वास की तारीफ करने लगा। लोग उन्हें “Graceful Diplomat” कहने लगे। उन्होंने साफ कहा कि भारत किसी गुट का हिस्सा नहीं बनेगा। भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर चलेगा। उस दौर में यह बयान दुनिया के लिए बहुत बड़ा संदेश था।

संयुक्त राष्ट्र में जब पूरी दुनिया उनकी बात सुनती थी।

12 मई 1953 भारत के लिए ऐतिहासिक दिन बन गया। विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष चुनी गईं। यह सिर्फ उनकी नहीं। पूरे भारत की जीत थी। उस दौर में पश्चिमी देश एशियाई महिलाओं को कमजोर समझते थे। लेकिन विजयलक्ष्मी ने यह सोच तोड़ दी। जब वह अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठती थीं। पूरी दुनिया उनकी बात ध्यान से सुनती थी। उनके भाषण शांत होते थे। लेकिन बेहद प्रभावशाली होते थे। उन्होंने मानवाधिकारों की बात की। शांति की बात की। अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर दिया। पहली बार दुनिया ने देखा कि भारत की एक महिला वैश्विक राजनीति को प्रभावित कर सकती है। उस समय भारत नया-नया आजाद हुआ था। मगर विजयलक्ष्मी ने दुनिया को महसूस कराया कि भारत किसी से कम नहीं है।

क्या सच में उन्होंने तीसरा विश्व युद्ध टलवाने में भूमिका निभाई थी।

1950 का दशक बेहद खतरनाक था। उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच युद्ध चल रहा था। अमेरिका और चीन आमने-सामने खड़े थे। दुनिया को डर था कि कहीं परमाणु हथियार इस्तेमाल न हो जाएं। अगर ऐसा होता। तो तीसरा विश्व युद्ध शुरू हो सकता था। इसी समय विजयलक्ष्मी पंडित शांति की सबसे बड़ी आवाज बनकर सामने आईं। उन्होंने बातचीत का रास्ता सुझाया। वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर परमाणु हथियारों का विरोध किया। उनका संदेश साफ था। परमाणु युद्ध में कोई नहीं जीतता। सिर्फ इंसानियत हारती है। उनकी कूटनीति और शांति की अपील का असर दुनिया पर पड़ा। यही कारण है कि कई इतिहासकार उन्हें भारत की सबसे प्रभावशाली महिला कूटनीतिज्ञ मानते हैं। वह सिर्फ नेता नहीं थीं। वह दुनिया को बचाने वाली आवाज थीं।

इंदिरा गांधी से रिश्तों में क्यों आ गई थी दूरी।

लोग मानते हैं कि नेहरू परिवार हमेशा एकजुट रहा। मगर सच्चाई अलग थी। विजयलक्ष्मी और उनकी भतीजी इंदिरा गांधी के रिश्तों में समय के साथ दूरी बढ़ने लगी। खासकर आपातकाल के दौरान मतभेद खुलकर सामने आए। विजयलक्ष्मी ने इंदिरा गांधी का खुला विरोध किया। उन्होंने जनता पार्टी का समर्थन किया। सार्वजनिक मंचों से कहा कि आपातकाल लोकतंत्र के खिलाफ है। यह फैसला आसान नहीं था। वह अपनी ही भतीजी के खिलाफ खड़ी थीं। लेकिन उनके लिए सिद्धांत परिवार से ऊपर थे। यही वजह थी कि लोग उन्हें निडर महिला कहते थे। वह सत्ता के सामने झुकने वालों में नहीं थीं। उन्होंने हमेशा लोकतंत्र को सबसे ऊपर रखा।

क्या वह खुद प्रधानमंत्री बनना चाहती थीं।

1966 में लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद नए प्रधानमंत्री की तलाश शुरू हुई। उस समय चर्चा थी कि विजयलक्ष्मी पंडित भी इस पद की दावेदार बनना चाहती थीं। हालांकि कांग्रेस नेतृत्व ने इंदिरा गांधी को चुना। इसके बाद दोनों के रिश्तों में और दूरी आ गई। कई किताबों में लिखा गया कि धीरे-धीरे विजयलक्ष्मी को साइडलाइन किया जाने लगा। मुलाकातों में भी ठंडापन दिखने लगा। लेकिन विजयलक्ष्मी ने कभी सार्वजनिक रूप से निजी शिकायतें नहीं कीं। उन्होंने हमेशा लोकतंत्र और मूल्यों की बात की। शायद यही बात उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती थी। वह कुर्सी से ज्यादा सिद्धांतों को महत्व देती थीं।

आखिरी समय में उनके पास सत्ता नहीं थी। लेकिन सम्मान पूरी दुनिया का था।

राजनीति से संन्यास लेने के बाद विजयलक्ष्मी देहरादून में रहने लगीं। अब उनके पास कोई बड़ा पद नहीं था। सत्ता की चमक भी नहीं थी। मगर सम्मान पहले जैसा ही था। लोग आज भी उन्हें भारत की सबसे प्रभावशाली महिला राजनयिक मानते थे। दुनिया उन्हें याद करती थी। विश्वविद्यालय उन्हें बुलाते थे। विदेशी नेता उनका सम्मान करते थे। 1 दिसंबर 1990 को उन्होंने अंतिम सांस ली। वह 90 साल की थीं। लेकिन उनकी कहानी खत्म नहीं हुई। आज भी उनका नाम भारतीय राजनीति के सबसे साहसी अध्यायों में गिना जाता है।

क्यों आज भी विजयलक्ष्मी पंडित की कहानी हर भारतीय को जाननी चाहिए।

आज की पीढ़ी शायद उनका नाम कम सुनती है। लेकिन उनकी कहानी हर भारतीय को जाननी चाहिए। वह सिर्फ नेहरू परिवार की सदस्य नहीं थीं। वह भारत की ताकत थीं। उन्होंने पुरुष प्रधान राजनीति को चुनौती दी। संयुक्त राष्ट्र में इतिहास रचा। परमाणु युद्ध के खिलाफ दुनिया को चेताया। लोकतंत्र बचाने के लिए अपनी ही भतीजी के खिलाफ खड़ी हुईं। यही कारण है कि विजयलक्ष्मी पंडित सिर्फ एक नेता नहीं थीं। वह एक विचार थीं। एक साहस थीं। उन्होंने दुनिया को दिखाया कि भारतीय महिलाएं सिर्फ घर नहीं संभालतीं। जरूरत पड़े तो पूरी दुनिया की दिशा बदल सकती हैं। यही वजह है कि OLDISGOLDFILMS आज भी उनकी कहानी को भारत की सबसे प्रेरणादायक विरासत मानता है।

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