
एक विशाल शरीर, चौड़ा सीना, मजबूत भुजाएं और चेहरे पर अद्भुत आत्मविश्वास। जब वह अखाड़े में उतरते थे, तो सामने खड़ा पहलवान मुकाबला शुरू होने से पहले ही दबाव महसूस करने लगता था। दुनिया के कई देशों में उनके नाम की चर्चा होती थी। दर्शकों को विश्वास था कि चाहे प्रतिद्वंद्वी कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, जीत अंत में भारत के इस शेर की ही होगी।
वह केवल एक पहलवान नहीं थे। वह भारतीय शक्ति, अनुशासन और आत्मसम्मान के प्रतीक बन चुके थे। उन्होंने अखाड़े में विदेशी पहलवानों को चुनौती दी। फिल्मों में असंभव दिखाई देने वाले कारनामे किए। फिर टेलीविजन पर भगवान हनुमान बनकर करोड़ों लोगों के दिलों में ऐसी जगह बनाई कि दर्शक उनके सामने श्रद्धा से सिर झुकाने लगे।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया के सबसे ताकतवर पहलवानों में गिने जाने वाले दारा सिंह को फिल्मों में आने की प्रेरणा किसने दी थी? वह कौन-सी मुलाकात थी जिसने उनकी पूरी सोच बदल दी? और अपने जीवन के अंतिम दिनों में यह महान योद्धा किस संघर्ष से गुजर रहा था?
यह कहानी केवल एक विश्व विजेता पहलवान की नहीं है। यह कहानी एक किसान परिवार के साधारण बच्चे, एक जिम्मेदार पिता, एक संवेदनशील इंसान, एक सफल अभिनेता और भारत के अमर हनुमान की है।
वह बच्चा, जिसकी पढ़ाई परिवार को मंजूर नहीं थी
19 नवंबर 1928 को पंजाब के अमृतसर जिले के धरमूचक गांव में बलवंत कौर और सूरत सिंह रंधावा के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। परिवार ने उसका नाम दीदार सिंह रंधावा रखा। बाद में यही बच्चा पूरी दुनिया में दारा सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
उनका बचपन किसी बड़े शहर की सुविधाओं में नहीं बीता। गांव का जीवन कठिन था। खेतों में काम करना, पशुओं की देखभाल करना और परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाना रोजमर्रा का हिस्सा था। उस समय ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को लेकर जागरूकता भी बहुत कम थी।
दारा सिंह की मां चाहती थीं कि उनका बेटा पढ़े। उन्होंने उसे विद्यालय में दाखिल भी करवाया। हालांकि, परिवार के बुजुर्गों को यह फैसला पसंद नहीं आया। बताया जाता है कि उनके दादाजी ने स्कूल से उनका नाम कटवा दिया। उन्हें लगता था कि बच्चे को किताबों के बजाय खेतों और परिवार के कामों में ध्यान देना चाहिए।
कुछ समय बाद उनकी मां के गांव से आए एक पंडित ने परिस्थिति बदल दी। उन्होंने दारा सिंह की मां को भरोसा दिलाया कि वह बच्चे को अपने साथ रखकर शिक्षा देंगे। काफी प्रयास के बाद परिवार को मनाया गया। दारा सिंह ने उनके पास रहकर जितनी भी संभव हो सकी, उतनी पढ़ाई की।
उस दौर में गांव के बहुत कम लोग चिट्ठी पढ़ पाते थे। दारा सिंह भी उन चुनिंदा लोगों में शामिल हो गए, जिन्हें पत्र पढ़ना आता था। भविष्य में उनका परिचय विश्व विजेता पहलवान और अभिनेता के रूप में बना, लेकिन उनके व्यक्तित्व की नींव में उनकी मां की शिक्षा के प्रति जिद भी शामिल थी।
नौ साल की उम्र में विवाह और बचपन में ही जिम्मेदारियों का बोझ
दारा सिंह का बचपन आज के बच्चों जैसा नहीं था। बताया जाता है कि केवल नौ वर्ष की उम्र में उनका विवाह कर दिया गया था। उनकी पत्नी उम्र में उनसे बड़ी थीं और शारीरिक रूप से भी उनसे अधिक मजबूत दिखाई देती थीं।
कहा जाता है कि उनकी मां को चिंता रहती थी कि उनका बेटा बहू की तुलना में कमजोर दिखता है। इसलिए उन्होंने दारा सिंह के खान-पान और शारीरिक मेहनत पर विशेष ध्यान देना शुरू किया। खेतों में लगातार काम करने से उनके शरीर में ताकत आने लगी। पौष्टिक ग्रामीण भोजन ने भी उनके शरीर को मजबूत बनाया।
बहुत कम उम्र में उनके कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई। लगभग सत्रह वर्ष की आयु तक वह एक बच्चे के पिता भी बन चुके थे। जिस उम्र में अधिकतर युवक अपने भविष्य के बारे में सोचते हैं, उस उम्र में दारा सिंह को परिवार चलाने की चिंता सताने लगी थी।
उन्हें काम की आवश्यकता थी। बेहतर कमाई की उम्मीद में उन्होंने अपने चाचा से विदेश जाने की जिद की। आखिरकार वह रोजगार की तलाश में सिंगापुर पहुंच गए। उस समय उन्हें नहीं मालूम था कि यही यात्रा उनका भाग्य बदल देगी।
वह नौकरी तलाशने निकले थे, लेकिन नियति उन्हें अखाड़े की ओर ले जा रही थी।
सिंगापुर में किसने पहचानी उस मजदूर के भीतर छिपे पहलवान की ताकत?
सिंगापुर पहुंचने के बाद दारा सिंह ने रोजी-रोटी के लिए कई तरह के छोटे-मोटे काम किए। उनका शरीर सामान्य युवकों से अलग दिखाई देता था। लंबी कद-काठी, चौड़े कंधे और खेतों में काम करने से बनी मजबूत मांसपेशियां लोगों का ध्यान आकर्षित करती थीं।
उनके आसपास के कुछ लोगों ने उन्हें पहलवानी करने की सलाह दी। दारा सिंह को बचपन से कुश्ती में रुचि थी। इसलिए उन्होंने स्थानीय अखाड़ों में अभ्यास करना शुरू कर दिया। शुरुआत में यह केवल शौक और अतिरिक्त कमाई का माध्यम था। धीरे-धीरे कुश्ती उनके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य बन गई।
उन्होंने पारंपरिक भारतीय कुश्ती के साथ फ्रीस्टाइल रेसलिंग के दांव-पेंच भी सीखे। लगभग तीन वर्षों की कठोर मेहनत ने उन्हें एक प्रशिक्षित पेशेवर पहलवान बना दिया। उनकी शुरुआती प्रोफेशनल कुश्तियों में से एक मुकाबला एक इतालवी पहलवान के साथ हुआ। यह मुकाबला बराबरी पर समाप्त हुआ और उन्हें लगभग 50 डॉलर मिले।
राशि बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन उस मुकाबले ने उन्हें यह एहसास करा दिया कि उनकी ताकत उन्हें नई पहचान दिला सकती है।
जल्द ही उन्होंने जाने-माने पहलवान तारलोक सिंह को चुनौती दी। घोषणा की गई थी कि विजेता को मलेशिया का चैंपियन माना जाएगा। दारा सिंह ने मुकाबला जीता और मलेशिया के कुश्ती चैंपियन बन गए। यहीं से उनकी प्रसिद्धि का सफर तेज हो गया।
अब वह नौकरी खोजने वाला साधारण युवक नहीं थे। वह विदेशी धरती पर भारत की ताकत का प्रतिनिधित्व करने वाला पहलवान बन चुके थे।
जब दो सौ किलो के किंग कॉन्ग के सामने खड़ा हुआ भारत का शेर
दारा सिंह के करियर का सबसे प्रसिद्ध नाम किंग कॉन्ग से जुड़ा है। किंग कॉन्ग अपने विशाल शरीर और आक्रामक कुश्ती शैली के लिए जाना जाता था। बताया जाता है कि उसका वजन लगभग दो सौ किलो था। उसका नाम सुनकर ही कई पहलवान मुकाबले से पीछे हट जाते थे।
जब दारा सिंह और किंग कॉन्ग आमने-सामने आए, तो दर्शकों की उत्सुकता चरम पर थी। एक ओर पहाड़ जैसा भारी-भरकम विदेशी पहलवान था। दूसरी ओर भारत का चुस्त, शक्तिशाली और आत्मविश्वासी दारा सिंह।
मुकाबले में केवल ताकत ही महत्वपूर्ण नहीं थी। गति, संतुलन, रणनीति और सही समय पर सही दांव लगाना भी आवश्यक था। दारा सिंह ने अपनी तकनीक और अद्भुत शक्ति से किंग कॉन्ग को पराजित किया। इस मुकाबले ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई।
उनके बारे में कई रोमांचक किस्से प्रचलित हुए। कुछ विवरणों में कहा गया कि उन्होंने किंग कॉन्ग को उठाकर फेंक दिया था। यह दृश्य भारतीय दर्शकों की स्मृतियों में साहस और शक्ति के प्रतीक के रूप में दर्ज हो गया।
दारा सिंह का नाम धीरे-धीरे ऐसी गारंटी बन गया, जिसके साथ दर्शक जीत की उम्मीद जोड़ते थे। अखाड़े में उनके उतरते ही “दारा सिंह” के नारों से वातावरण गूंजने लगता था।
क्या वास्तव में दारा सिंह कभी कोई कुश्ती नहीं हारे?
दारा सिंह के बारे में सबसे अधिक दोहराया जाने वाला दावा यह है कि उन्होंने अपने पेशेवर करियर में पांच सौ से अधिक मुकाबले लड़े और कभी पराजित नहीं हुए। उनके कुछ शुरुआती मुकाबले बराबरी पर समाप्त हुए, लेकिन उनकी पहचान एक अजेय पहलवान के रूप में ही बनी।
1959 में उन्होंने पूर्व विश्व चैंपियन जॉर्ज गॉर्डिएन्को को हराकर कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप जीती। इस जीत ने उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर भी प्रसिद्ध बना दिया। इसके बाद विश्व के अलग-अलग देशों के पहलवान उनके सामने आए।
1968 में उन्होंने अमेरिका के प्रसिद्ध पहलवान लू थेज को मुकाबले में हराकर फ्रीस्टाइल रेसलिंग की विश्व चैंपियनशिप से जुड़ी बड़ी उपलब्धि हासिल की। इस जीत के बाद उन्हें विश्व चैंपियन के रूप में सम्मान मिला।
दारा सिंह लगभग पचास वर्ष की आयु तक कुश्ती से जुड़े रहे। वर्ष 1983 में उन्होंने औपचारिक रूप से पहलवानी से संन्यास लिया। लेकिन अखाड़ा छोड़ने के बाद भी उन्होंने भारतीय कुश्ती से रिश्ता नहीं तोड़ा।
वह गांवों और छोटे शहरों में आयोजित दंगलों में जाते थे। युवा पहलवानों का उत्साह बढ़ाते थे। उन्हें अनुशासन, सही आहार और नियमित अभ्यास का महत्व समझाते थे। उनके लिए पहलवानी केवल शरीर बनाने का माध्यम नहीं थी। वह चरित्र, संयम और आत्मसम्मान की शिक्षा थी।
उनकी ताकत का रहस्य क्या था? सामने आई हैरान करने वाली डाइट
दारा सिंह की ताकत को लेकर लोगों में हमेशा उत्सुकता रही। आखिर वह क्या खाते थे? उनका अभ्यास कैसा था? वह इतने लंबे समय तक मजबूत कैसे बने रहे?
उनकी आत्मकथा और उनसे जुड़े विवरणों में उनकी डाइट का उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि वह दूध, शुद्ध घी, बादाम की ठंडाई, मौसमी फल, सब्जियां, रोटियां और मांसाहारी भोजन लेते थे। उनकी आवश्यकता के अनुसार भोजन की मात्रा सामान्य व्यक्ति की तुलना में काफी अधिक थी।
कुछ विवरणों के अनुसार उनकी दिनचर्या में लगभग दो किलो दूध, बादाम की ठंडाई, घी, फल, मुरब्बा, रोटियां और प्रोटीन से भरपूर भोजन शामिल रहता था। हालांकि, उनकी ताकत का रहस्य केवल भोजन नहीं था।
वह नियमित अभ्यास करते थे। शरीर को आराम देने का समय तय था। नशे और अनियमित जीवन से दूर रहते थे। भोजन और व्यायाम के बीच संतुलन बनाए रखते थे। उनका मानना था कि पहलवान का सबसे बड़ा हथियार उसकी दिनचर्या होती है।
आज कई लोग केवल उनकी भारी डाइट की चर्चा करते हैं। लेकिन उस भोजन को पचाने के लिए वह घंटों कसरत भी करते थे। खेतों में बीता बचपन, अखाड़े की कठिन साधना और वर्षों का अनुशासन उनके मजबूत शरीर के असली आधार थे।
गामा पहलवान की वह हालत, जिसने दारा सिंह को भीतर तक हिला दिया
एक समय ऐसा था जब दारा सिंह केवल कुश्ती करना चाहते थे। उनकी लोकप्रियता देखकर फिल्म निर्माता उन्हें फिल्मों में लेना चाहते थे। कई बड़े प्रस्ताव उनके पास आते थे, लेकिन वह उन्हें ठुकरा देते थे। उनका मानना था कि उनका जीवन अखाड़े के लिए बना है।
फिर उनकी मुलाकात महान गामा पहलवान से हुई।
गामा पहलवान कभी दुनिया के सबसे शक्तिशाली पहलवानों में गिने जाते थे। उनके नाम से विरोधी डरते थे। लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में उनकी आर्थिक और शारीरिक स्थिति बहुत कमजोर हो गई थी। जब दारा सिंह को उनके हालात के बारे में पता चला, तो वह उनसे मिलने पहुंचे।
दारा सिंह के बेटे विंदू द्वारा सुनाए गए किस्से के अनुसार, उन्होंने गामा पहलवान को बेहद कमजोर अवस्था में देखा। जो व्यक्ति कभी दुनिया की बड़ी ताकतों को चुनौती देता था, वह अपने चेहरे पर बैठी मक्खी हटाने की स्थिति में भी नहीं था।
बताया जाता है कि गामा पहलवान ने दारा सिंह से कहा कि जवानी और ताकत हमेशा नहीं रहती। उन्होंने उन्हें सलाह दी कि अपनी पूरी जिंदगी केवल पहलवानी पर निर्भर न रखें और अपने भविष्य के बारे में भी सोचें।
इन शब्दों ने दारा सिंह को अंदर तक झकझोर दिया। लौटते समय उन्होंने गामा पहलवान की आर्थिक सहायता की। लेकिन वह उस घर से केवल भावुक होकर नहीं निकले थे। वह अपने भविष्य को लेकर एक नया निर्णय लेकर निकले थे।
मुंबई वापस पहुंचने के बाद उन्होंने फिल्मों के प्रस्ताव स्वीकार करने शुरू कर दिए। इतना ही नहीं, उन्होंने अन्य पहलवानों को भी फिल्मों में अवसर दिलाने की कोशिश की, ताकि वे अखाड़े के बाहर भी अपनी आजीविका सुरक्षित कर सकें।
एक बूढ़े पहलवान की कमजोर अवस्था ने भारतीय सिनेमा को उसका सबसे शक्तिशाली नायक दे दिया था।
अखाड़े का विजेता फिल्मों में कैसे बना सबसे महंगा स्टंट हीरो?
दारा सिंह ने 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगदिल’ से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। शुरुआती वर्षों में उन्हें छोटे किरदार और एक्शन दृश्य मिले। फिल्म निर्माता उनके शरीर और असली पहलवानी की क्षमता से प्रभावित थे।
उस दौर में तकनीक सीमित थी। एक्शन दृश्यों में वास्तविक शारीरिक क्षमता की आवश्यकता पड़ती थी। दारा सिंह के लिए भारी वस्तुएं उठाना, विरोधियों को पटकना और खतरनाक स्टंट करना स्वाभाविक था। धीरे-धीरे वह स्टंट फिल्मों के सबसे लोकप्रिय अभिनेताओं में शामिल हो गए।
1962 की फिल्म ‘किंग कॉन्ग’ ने उन्हें मुख्य अभिनेता के रूप में बड़ी पहचान दी। फिल्म का नाम उनके प्रसिद्ध कुश्ती प्रतिद्वंद्वी से प्रेरित था। पर्दे पर उनकी मौजूदगी ने दर्शकों को उत्साहित किया।
दारा सिंह ने अभिनेत्री मुमताज के साथ कई फिल्मों में काम किया। दोनों की जोड़ी स्टंट और एक्शन फिल्मों में बेहद लोकप्रिय हुई। कहा जाता है कि दोनों ने लगभग सोलह फिल्मों में साथ काम किया। उस समय मुमताज भी अपने करियर के शुरुआती दौर में थीं।
दारा सिंह को तथाकथित बी-ग्रेड एक्शन फिल्मों का सबसे बड़ा सितारा कहा जाने लगा। कुछ विवरणों के अनुसार उन्हें एक फिल्म के लिए लगभग चार लाख रुपये तक मिलने लगे थे, जो उस दौर में बहुत बड़ी रकम थी।
उन्होंने ‘सिकंदर-ए-आजम’ में सिकंदर की भूमिका निभाई। इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर भी महत्वपूर्ण भूमिका में थे। दारा सिंह ने हिंदी और पंजाबी सिनेमा की सौ से अधिक फिल्मों में अभिनेता, निर्देशक और निर्माता के रूप में योगदान दिया।
लेकिन फिल्मों की सफलता के बाद भी उनका सबसे अमर किरदार अभी सामने आना बाकी था।
जिस दिन पहलवान नहीं, साक्षात हनुमान दिखाई दिए
दारा सिंह का शरीर, आवाज और व्यक्तित्व पौराणिक पात्रों के लिए बिल्कुल उपयुक्त माना जाता था। उन्होंने 1976 की फिल्म ‘बजरंगबली’ में भगवान हनुमान की भूमिका निभाई। दर्शकों ने उन्हें इस किरदार में खूब पसंद किया।
इसके बाद रामानंद सागर ने उन्हें धारावाहिक ‘रामायण’ में हनुमान की भूमिका के लिए चुना। शुरुआत में दारा सिंह इस भूमिका को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे। उम्र बढ़ चुकी थी और उन्हें लगता था कि हनुमान जैसे ऊर्जावान पात्र को निभाना कठिन होगा।
लेकिन जब वह पर्दे पर आए, तो इतिहास बन गया।
1980 के दशक में रविवार की सुबह सड़कें सूनी हो जाती थीं। परिवार टेलीविजन के सामने बैठ जाते थे। जैसे ही दारा सिंह हनुमान के रूप में दिखाई देते, कई दर्शक श्रद्धा से हाथ जोड़ लेते थे।
उन्होंने हनुमान को केवल शारीरिक बल वाला योद्धा नहीं बनाया। उनके अभिनय में भक्ति, विनम्रता, निष्ठा, मासूमियत और प्रभु राम के प्रति समर्पण दिखाई देता था। यही कारण था कि दर्शकों ने अभिनेता और पात्र के बीच का अंतर लगभग भुला दिया।
लोग सार्वजनिक स्थानों पर उनके पैर छूने लगते थे। कई लोग उन्हें वास्तव में बजरंगबली का स्वरूप मानते थे। दारा सिंह ने ‘महाभारत’ सहित अन्य प्रस्तुतियों में भी पौराणिक पात्र निभाए, लेकिन हनुमान की भूमिका उनकी पहचान का स्थायी हिस्सा बन गई।
अखाड़े में उन्होंने विदेशी पहलवानों को हराया था। पर्दे पर हनुमान बनकर उन्होंने करोड़ों भारतीयों के हृदय जीत लिए।
ताकत के पीछे छिपा था एक बेहद संवेदनशील इंसान
दारा सिंह को देखकर लोग उनकी शारीरिक शक्ति की चर्चा करते थे। लेकिन उनके निकट रहने वाले लोग उनकी सादगी और संवेदनशीलता को याद करते हैं।
गामा पहलवान की सहायता का किस्सा उनके स्वभाव का महत्वपूर्ण उदाहरण है। उन्होंने केवल पैसे देकर सहायता नहीं की। उन्होंने उस अनुभव से सीख ली और दूसरे पहलवानों को भी रोजगार दिलाने की कोशिश की।
कुश्ती से संन्यास लेने के बाद वह देशभर में घूमते रहे। छोटे अखाड़ों के पहलवानों से मिलते थे। ग्रामीण युवाओं को खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। उन्हें पता था कि प्रतिभा केवल बड़े शहरों में पैदा नहीं होती। भारत के गांवों में भी असाधारण पहलवान मौजूद हैं, जिन्हें सही अवसर की आवश्यकता है।
सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। वह खेल जगत से राज्यसभा पहुंचने वाली शुरुआती प्रमुख हस्तियों में शामिल थे। राजनीति में भी उन्होंने अपनी पहचान एक शांत और सम्मानित व्यक्ति के रूप में बनाए रखी।
अखाड़े में उनकी ताकत बोलती थी। लेकिन निजी जीवन में उनका व्यवहार उनकी महानता बताता था।
जिस शरीर ने पांच सौ मुकाबले लड़े, वही धीरे-धीरे क्यों होने लगा कमजोर?
बढ़ती उम्र के साथ दारा सिंह का शरीर भी स्वास्थ्य समस्याओं से घिरने लगा। परिवार को पहली बार गंभीर चिंता तब हुई, जब लगभग 75 वर्ष की उम्र में उनके दाएं हाथ और पैर में कमजोरी दिखाई देने लगी।
डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्या नसों पर दबाव डाल रही थी। शुरुआत में व्यायाम और इलाज से उन्हें कुछ राहत मिली। इसके बाद घुटने की समस्या बढ़ी और उन्हें घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी की सलाह दी गई।
बताया जाता है कि पहले वह सर्जरी के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनके मित्र धर्मेंद्र भी ऐसी सर्जरी करवा चुके हैं और उन्हें लाभ मिला है, तो वह तैयार हो गए।
परिवार के अनुसार, लगभग 82 वर्ष की आयु तक वह काफी सक्रिय रहे। इसके बाद उनकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी। दायां हाथ कमजोर हो गया। खाना खाने और चलने में कठिनाई होने लगी।
डॉक्टरों ने मोटर न्यूरॉन रोग जैसी गंभीर समस्या की आशंका बताई। इसका प्रभाव शरीर की मांसपेशियों और उनकी गतिविधियों पर पड़ता है। इलाज के कई प्रयास किए गए। इंजेक्शन, आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक और एलोपैथिक उपचार भी अपनाए गए। लेकिन उनकी कमजोरी बढ़ती गई।
जिस व्यक्ति को कभी दुनिया उठाकर फेंकने की ताकत वाला पहलवान मानती थी, अब उसे उठने और चलने के लिए सहारे की आवश्यकता पड़ने लगी थी।
यही जीवन का सबसे कठोर सत्य है। समय के सामने सबसे शक्तिशाली शरीर भी एक दिन असहाय हो सकता है।
अंतिम दिनों में दारा सिंह ने अस्पताल जाने से क्यों कर दिया था इनकार?
विंदू दारा सिंह द्वारा विभिन्न साक्षात्कारों में साझा किए गए विवरणों के अनुसार, जीवन के अंतिम दिनों में दारा सिंह अस्पताल नहीं जाना चाहते थे। वह अपने परिवार से कह चुके थे कि उन्हें बार-बार अस्पताल न ले जाया जाए।
जुलाई 2012 में उनकी हालत अचानक गंभीर हो गई। वह अचेत हो गए। परिवार उन्हें एंबुलेंस से अस्पताल लेकर गया। वहां डॉक्टरों ने उनकी स्थिति बेहद नाजुक बताई। शरीर में ऑक्सीजन की कमी के कारण मस्तिष्क पर गंभीर असर पड़ा था।
डॉक्टरों ने परिवार को संकेत दिया कि उनके स्वस्थ होने की संभावना बहुत कम है। तब परिवार ने उन्हें घर वापस लाने का निर्णय किया। विंदू चाहते थे कि उनके पिता के जीवन के अंतिम क्षण अस्पताल की मशीनों के बीच नहीं, बल्कि अपने परिवार और अपने घर में बीतें।
घर में उनकी पत्नी कुछ समय तक उनके पास अकेली बैठीं। वह साथी, जिसने दारा सिंह के संघर्ष, प्रसिद्धि, जीत, फिल्मों और जीवन के हर उतार-चढ़ाव को देखा था, अब उनके अंतिम सफर में भी उनके साथ थी।
12 जुलाई 2012 की सुबह दारा सिंह ने अंतिम सांस ली।
उनकी इच्छा के अनुसार उनकी अस्थियों का एक हिस्सा समुद्र में प्रवाहित किया गया। परिवार ने अत्यधिक सार्वजनिक विलाप से दूरी बनाए रखी। उनका मानना था कि दारा सिंह जीवन को शक्ति और सम्मान के साथ जीने में विश्वास करते थे। वह अपने जाने के बाद परिवार को टूटा हुआ नहीं देखना चाहते थे।
फिल्म जगत के कई कलाकार परिवार से मिलने पहुंचे। धर्मेंद्र का परिवार, अनिल कपूर, संजय दत्त और अभिषेक बच्चन सहित अनेक लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। हर व्यक्ति के पास दारा सिंह की सादगी, अनुशासन और मददगार स्वभाव से जुड़ी कोई न कोई स्मृति थी।
आखिर दारा सिंह की सबसे बड़ी जीत कौन-सी थी?
क्या उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि किंग कॉन्ग को हराना थी? क्या वह विश्व चैंपियन बनना था? क्या फिल्मों में सफल होना था? या फिर हनुमान बनकर करोड़ों दर्शकों का प्रेम पाना?
शायद उनकी सबसे बड़ी जीत इनमें से किसी एक उपलब्धि में नहीं थी।
उनकी असली जीत यह थी कि उन्होंने परिस्थितियों को कभी अपने भविष्य का अंतिम निर्णय नहीं बनने दिया। पढ़ाई छूटी, लेकिन सीखना नहीं छोड़ा। कम उम्र में जिम्मेदारियां आईं, लेकिन सपने नहीं छोड़े। नौकरी की तलाश में विदेश गए, लेकिन अपने भीतर के पहलवान को पहचान लिया।
पहलवानी में सफलता मिली, लेकिन समय रहते नए भविष्य की ओर कदम बढ़ाया। फिल्मों में आए, लेकिन अखाड़े और अपने साथी पहलवानों को नहीं भूले। हनुमान बने, लेकिन लोकप्रियता के बावजूद विनम्र बने रहे।
दारा सिंह हमें बताते हैं कि ताकत केवल भारी वजन उठाने में नहीं होती। असली ताकत समय के साथ खुद को बदलने में होती है। दूसरों की सहायता करने में होती है। सफलता मिलने के बाद भी जमीन से जुड़े रहने में होती है।
उनका शरीर एक दिन कमजोर पड़ गया, लेकिन उनकी छवि आज भी भारतीय जनमानस में उतनी ही मजबूत है। वह अखाड़े के विजेता थे। वह पर्दे के महानायक थे। वह करोड़ों श्रद्धालुओं के हनुमान थे।
और सबसे बढ़कर, वह ऐसे भारतीय थे जिन्होंने दुनिया को दिखाया कि गांव की मिट्टी से उठकर भी विश्व विजेता बना जा सकता है।
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