
दिसंबर 1971 की वो सर्द रात।
अरब सागर की लहरें बेचैन थीं।
चारों तरफ युद्ध का तनाव था।
भारतीय नौसेना दुश्मन की पनडुब्बियों को खोज रही थी।
समंदर के बीच INS खुकरी आगे बढ़ रहा था।
उस जहाज़ पर मौजूद हर सैनिक जानता था कि खतरा पास है।
लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही मिनटों में इतिहास लिखा जाएगा।
उस जहाज़ के कप्तान थे — Captain Mahendra Nath Mulla।
एक ऐसा नाम, जिसने मौत को चुना, लेकिन अपने जहाज़ को नहीं छोड़ा।
आज भी भारतीय नौसेना में उनका साहस मिसाल माना जाता है।
OLDISGOLDFILMS की इस कहानी में जानिए उस कप्तान की आखिरी रात, जिसने अपने जवानों को बचाया और खुद समंदर में समा गया।
गोरखपुर का वो लड़का, जो समंदर का शेर बना
15 मई 1926 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में उनका जन्म हुआ।
वो एक कश्मीरी परिवार से थे।
उनका परिवार इलाहाबाद के न्यायिक जगत में काफी सम्मानित माना जाता था।
घर में पढ़ाई और अनुशासन का माहौल था।
लेकिन महेंद्र नाथ मुल्ला का सपना अलग था।
उन्हें समुद्र आकर्षित करता था।
उन्हें यूनिफॉर्म पहनने का जुनून था।
यही कारण था कि उन्होंने 1946 में रॉयल इंडियन नेवी जॉइन की।
इसके बाद उन्हें ट्रेनिंग के लिए यूनाइटेड किंगडम भेजा गया।
वहां उन्होंने आधुनिक नौसेना की बारीकियां सीखीं।
उनके साथी कहते थे कि वो बेहद शांत अधिकारी थे।
लेकिन जरूरत पड़ने पर उनका निर्णय बिजली जैसा तेज होता था।
धीरे-धीरे उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली।
उनकी बुद्धिमानी और नेतृत्व क्षमता की चर्चा होने लगी।
जब हर जिम्मेदारी को उन्होंने सम्मान माना
1948 में उन्हें आधिकारिक कमीशन मिला।
इसके बाद उन्होंने कई बड़े युद्धपोतों पर सेवा दी।
उन्होंने INS गोमती, HMIS मद्रास और HMIS किष्टना जैसे जहाज़ों पर काम किया।
वो सिर्फ आदेश देने वाले अधिकारी नहीं थे।
वो अपने जवानों को परिवार मानते थे।
उनके जूनियर अफसर बताते थे कि मुल्ला हमेशा जवानों की समस्याएं सुनते थे।
वो अनुशासन के साथ संवेदनशीलता भी रखते थे।
यही वजह थी कि उनकी टीम उन पर आंख बंद करके भरोसा करती थी।
1965 से 1967 तक उन्होंने यूनाइटेड किंगडम में भारतीय उच्चायोग में भी सेवा दी।
इस दौरान उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक रणनीतियां समझीं।
लेकिन उनका असली इम्तिहान अभी बाकी था।
1971 का युद्ध और समंदर में छिपा दुश्मन
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो चुका था।
पूरा देश युद्ध की खबरों से भरा था।
इसी दौरान भारतीय नौसेना को एक खतरनाक मिशन मिला।
उत्तरी अरब सागर में दुश्मन की पनडुब्बी घूम रही थी।
उसका नाम था PNS Hangor।
इस पनडुब्बी को ढूंढकर खत्म करना जरूरी था।
यह जिम्मेदारी INS खुकरी, INS किरपान और INS कुठार को दी गई।
इस पूरे स्क्वाड्रन की कमान कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला के हाथ में थी।
समंदर शांत दिख रहा था।
लेकिन पानी के नीचे मौत घूम रही थी।
हर पल खतरा बढ़ रहा था।
फिर आई 9 दिसंबर 1971 की रात।
वो एक धमाका… जिसने सबकुछ बदल दिया
रात लगभग 8 बजकर 50 मिनट।
अचानक समंदर में जोरदार धमाका हुआ।
दुश्मन की पनडुब्बी ने INS खुकरी पर टॉरपीडो दाग दिया था।
जहाज़ बुरी तरह हिल गया।
कुछ ही सेकंड में अफरा-तफरी मच गई।
पानी तेजी से जहाज़ में भरने लगा।
कई जवान घायल हो गए।
कुछ लोग समझ ही नहीं पाए कि हुआ क्या है।
लेकिन उस भयावह स्थिति में भी कैप्टन मुल्ला शांत रहे।
उन्होंने घबराने के बजाय आदेश देना शुरू किया।
उन्होंने तुरंत जवानों को जहाज़ खाली करने को कहा।
हर तरफ चीखें थीं।
समंदर अंधेरे में गरज रहा था।
लेकिन कप्तान की आवाज स्थिर थी।
वो हर जवान को बचाने की कोशिश कर रहे थे।
जब कप्तान ने अपनी लाइफ जैकेट उतार दी
उस रात जो हुआ, उसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया।
एक जवान के पास लाइफ जैकेट नहीं थी।
उसकी जान खतरे में थी।
तभी कैप्टन मुल्ला ने अपनी लाइफ जैकेट उतार दी।
उन्होंने वह जैकेट उस जवान को पकड़ा दी।
फिर बोले — “बच्चू, कूदकर जान बचाओ।”
ये शब्द आज भी भारतीय नौसेना में याद किए जाते हैं।
उस समय वो खुद अपनी जान बचा सकते थे।
लेकिन उन्होंने अपने जवानों को चुना।
वो आखिरी समय तक रेस्क्यू ऑपरेशन संभालते रहे।
उन्होंने कई सैनिकों को बाहर निकलने में मदद की।
जब ज्यादातर जवान जहाज़ छोड़ चुके थे, तब भी वो वहीं खड़े रहे।
धीरे-धीरे INS खुकरी समंदर में डूबने लगा।
लेकिन कैप्टन मुल्ला पीछे नहीं हटे।
आखिरी बार उन्हें कहां देखा गया था?
कई बचे हुए सैनिकों ने बाद में बताया कि आखिरी समय में कैप्टन मुल्ला जहाज़ के ब्रिज की तरफ बढ़े थे।
वो देखना चाहते थे कि कोई जवान पीछे तो नहीं रह गया।
उनके चेहरे पर डर नहीं था।
वो पूरी तरह शांत दिखाई दे रहे थे।
कुछ सैनिकों ने बताया कि वो कुर्सी पर बैठे थे।
कुछ ने कहा कि उनके हाथ में सिगरेट थी।
हालांकि इन बातों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई।
लेकिन एक बात तय थी।
उन्होंने कप्तान होने की जिम्मेदारी आखिर तक निभाई।
कुछ ही मिनटों बाद INS खुकरी समुद्र में समा गया।
उसके साथ कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला भी हमेशा के लिए अमर हो गए।
पूरा देश क्यों रो पड़ा था?
जब यह खबर भारत पहुंची, पूरा देश स्तब्ध रह गया।
लोगों ने पहली बार किसी भारतीय नौसेना कप्तान की ऐसी कहानी सुनी थी।
एक ऐसा अधिकारी, जिसने खुद को बचाने से पहले अपने जवानों को चुना।
उनकी बहादुरी ने हर भारतीय को गर्व महसूस कराया।
इसके बाद उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र दिया गया।
यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है।
उनकी वीरता का उल्लेख आधिकारिक प्रशस्ति पत्र में भी किया गया।
उसमें लिखा गया कि उन्होंने बिना अपनी सुरक्षा की चिंता किए बचाव कार्य संभाला।
उन्होंने सर्वोच्च साहस और समर्पण दिखाया।
आज भी उनकी कहानी नौसेना अकादमियों में सुनाई जाती है।
आज भी जिंदा है कैप्टन मुल्ला की याद
दीव में INS खुकरी का स्मारक बनाया गया है।
यह स्मारक समुद्र की तरफ देखती पहाड़ी पर स्थित है।
यहां INS खुकरी का मॉडल रखा गया है।
जो हर आने वाले को उस रात की याद दिलाता है।
मुंबई के नेवी नगर में एक ऑडिटोरियम उनके नाम पर है।
वहां उनकी प्रतिमा भी मौजूद है।
बेंगलुरु और वेलिंगटन में भी उनके नाम से हॉल बनाए गए हैं।
साल 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया।
यह सम्मान हर किसी को नहीं मिलता।
यह उस इंसान को मिला, जिसने कर्तव्य को जिंदगी से बड़ा माना।
क्यों अलग थी कैप्टन मुल्ला की कहानी?
युद्ध में बहादुरी की कई कहानियां सुनाई जाती हैं।
लेकिन कुछ कहानियां इंसानियत सिखाती हैं।
कैप्टन मुल्ला की कहानी ऐसी ही है।
उन्होंने दिखाया कि असली नेता वही होता है, जो आखिरी समय तक अपने लोगों के साथ खड़ा रहे।
उन्होंने यह साबित किया कि वर्दी सिर्फ कपड़ा नहीं होती।
वो जिम्मेदारी होती है।
वो बलिदान होता है।
आज की पीढ़ी शायद उस दौर को महसूस नहीं कर सकती।
लेकिन जब भी भारतीय नौसेना का इतिहास लिखा जाएगा, कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला का नाम हमेशा सम्मान से लिया जाएगा।
क्योंकि कुछ लोग मरकर भी इतिहास में जिंदा रहते हैं।
और कैप्टन मुल्ला उन्हीं में से एक थे।
OLDISGOLDFILMS ऐसी कहानियों को हमेशा जिंदा रखेगा।
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