
16 मई 1996।
दिल्ली की राजनीति में हलचल थी।
देश त्रिशंकु जनादेश देख चुका था।
किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था।
लेकिन उसी दिन एक ऐसा चेहरा प्रधानमंत्री बना, जिसे विरोधी भी सम्मान देते थे।
वो नाम था
Atal Bihari Vajpayee।
अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था।
यह भारतीय राजनीति के नए दौर की शुरुआत थी।
दिलचस्प बात यह रही कि उनकी सरकार केवल 13 दिन चली।
लेकिन उन 13 दिनों ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी।
आज भी लोग पूछते हैं कि आखिर ऐसा क्या था उस नेता में, जिसकी छोटी सरकार भी इतिहास बन गई?
OLDISGOLDFILMS आज आपको उसी दौर में लेकर चल रहा है।
एक ऐसा दौर, जहां गठबंधन राजनीति का नया अध्याय लिखा जा रहा था।
1996 का चुनाव और देश की उलझी हुई राजनीति
1996 का लोकसभा चुनाव बेहद अलग था।
जनता कांग्रेस से नाराज दिख रही थी।
भ्रष्टाचार और अस्थिरता बड़े मुद्दे बन चुके थे।
चुनाव परिणाम आए तो किसी दल को बहुमत नहीं मिला।
543 सीटों वाली लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 272 था।
लेकिन कोई भी पार्टी वहां तक नहीं पहुंच सकी।
भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
बीजेपी ने 161 सीटें जीतीं।
वहीं कांग्रेस 140 सीटों पर सिमट गई।
यह पहली बार था जब बीजेपी ने कांग्रेस को सीटों में पीछे छोड़ा।
देश की राजनीति करवट ले रही थी।
इसी बीच कई क्षेत्रीय दल मजबूत होकर सामने आए।
तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार और आंध्र प्रदेश में क्षेत्रीय ताकतें बढ़ चुकी थीं।
दिल्ली की सत्ता अब अकेले दम पर नहीं जीती जा सकती थी।
राष्ट्रपति ने क्यों बुलाया अटल बिहारी वाजपेयी को?
चुनाव परिणाम के बाद देश में राजनीतिक संकट खड़ा हो गया।
कोई भी दल सरकार बनाने की स्थिति में नहीं था।
तब राष्ट्रपति
Shankar Dayal Sharma
ने सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता दिया।
अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के लिए बुलाया गया।
16 मई 1996 को उन्होंने भारत के 13वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
हालांकि कई लोग आज भी उन्हें गलती से 10वां प्रधानमंत्री लिख देते हैं।
लेकिन वह भारत के 13वें प्रधानमंत्री थे।
शपथ ग्रहण के समय माहौल बेहद भावुक था।
देश पहली बार बीजेपी नेतृत्व वाली सरकार देख रहा था।
अटल जी शांत थे।
लेकिन उनके चेहरे पर जिम्मेदारी साफ दिख रही थी।
किन दलों ने दिया था वाजपेयी को समर्थन?
सरकार बनाने के लिए बहुमत जरूरी था।
इसलिए बीजेपी ने सहयोगी दलों से बातचीत शुरू की।
उस समय
Mayawati
की पार्टी बसपा ने शुरुआती समर्थन संकेत दिए थे।
इसके अलावा
Shiromani Akali Dal
ने भी बीजेपी का साथ दिया।
कुछ छोटे दल और निर्दलीय सांसद भी समर्थन में आए।
लेकिन संख्या अभी भी कम थी।
समस्या यह थी कि कई क्षेत्रीय दल बीजेपी के साथ खुलकर आने से बच रहे थे।
उन्हें राजनीतिक नुकसान का डर था।
वाजपेयी लगातार समर्थन जुटाने में लगे रहे।
लेकिन राजनीति का गणित उनके पक्ष में नहीं बैठ पाया।
संसद में दिया गया वो ऐतिहासिक भाषण
जब साफ हो गया कि बहुमत जुटाना मुश्किल है, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने इस्तीफा देने का फैसला लिया।
28 मई 1996 को संसद में उनका भाषण हुआ।
यह भाषण आज भी भारतीय राजनीति के सबसे ऐतिहासिक भाषणों में गिना जाता है।
उन्होंने कहा था कि
“सत्ता का खेल चलता रहेगा। सरकारें आएंगी जाएंगी। पार्टियां बनेंगी बिगड़ेंगी। मगर यह देश रहना चाहिए।”
पूरा सदन शांत हो गया था।
विरोधी भी उनकी बात ध्यान से सुन रहे थे।
उन्होंने यह भी कहा कि
“हम संख्या बल के आगे सिर झुकाते हैं।”
उनकी आवाज में गुस्सा नहीं था।
कड़वाहट नहीं थी।
सिर्फ लोकतंत्र के प्रति सम्मान था।
यही कारण है कि 13 दिन की सरकार गिरने के बाद भी अटल जी लोगों के दिलों में और बड़े हो गए।
क्यों कहा जाता है उन्हें सहमति का नेता?
अटल बिहारी वाजपेयी की सबसे बड़ी ताकत उनका व्यक्तित्व था।
वे कट्टर विरोधियों से भी सम्मान पाते थे।
उनकी भाषा संयमित थी।
उनका व्यवहार शांत था।
और उनकी राजनीति टकराव से ज्यादा संवाद पर आधारित थी।
इसी वजह से उन्हें “सहमति का नेता” कहा गया।
वे शानदार वक्ता भी थे।
संसद में उनके भाषण सुनने के लिए लोग इंतजार करते थे।
राजनीति के साथ-साथ वे एक संवेदनशील कवि भी थे।
उनकी कविताओं में राष्ट्र, संघर्ष और आशा की झलक मिलती थी।
13 दिन बाद खत्म हुई सरकार, लेकिन खत्म नहीं हुआ सफर
13 दिन बाद सरकार गिर गई।
लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक सफर नहीं रुका।
1998 में फिर चुनाव हुए।
इस बार बीजेपी ने कई दलों के साथ गठबंधन बनाया।
समता पार्टी, अकाली दल और अन्य दल साथ आए।
अटल जी फिर प्रधानमंत्री बने।
हालांकि यह सरकार भी ज्यादा लंबी नहीं चली।
लेकिन 1999 में उन्होंने फिर वापसी की।
इस बार जनता ने उन्हें पूरा मौका दिया।
1999 से 2004 तक उन्होंने पूरा कार्यकाल पूरा किया।
वे पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।
उनके कार्यकाल में बदला भारत का चेहरा
प्रधानमंत्री रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने कई बड़े फैसले लिए।
उन्होंने
Pokhran-II
परमाणु परीक्षण करवाए।
इसके बाद दुनिया ने भारत को नई नजर से देखना शुरू किया।
उन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना शुरू की।
देश के बड़े शहर सड़कों से जोड़े गए।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने गांवों की तस्वीर बदली।
सर्व शिक्षा अभियान ने शिक्षा को नई दिशा दी।
वहीं पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने के लिए उन्होंने लाहौर बस यात्रा भी की।
हालांकि बाद में
Kargil War
हुआ।
फिर भी उन्होंने संवाद की नीति नहीं छोड़ी।
भारत रत्न से सम्मानित हुए अटल बिहारी वाजपेयी
2004 में चुनाव हारने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली।
स्वास्थ्य लगातार कमजोर होता गया।
लेकिन देश उन्हें भूला नहीं।
2015 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
यह सम्मान सिर्फ एक नेता को नहीं मिला था।
यह सम्मान उस व्यक्तित्व को मिला था जिसने राजनीति को गरिमा दी।
16 अगस्त 2018 को उनका निधन हुआ।
पूरा देश भावुक हो गया।
सड़कें लोगों से भर गईं।
हर आंख नम थी।
क्यों आज भी याद किए जाते हैं अटल जी?
आज की राजनीति में अक्सर कटुता दिखाई देती है।
लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी का दौर अलग था।
वे विरोधियों का सम्मान करते थे।
लोकतंत्र को सर्वोपरि मानते थे।
और सत्ता से ज्यादा देश को महत्व देते थे।
13 दिन की उनकी सरकार भले छोटी रही।
लेकिन उनकी पहचान विशाल बन गई।
शायद यही कारण है कि
आज भी लोग उन्हें सिर्फ प्रधानमंत्री नहीं,
बल्कि भारतीय राजनीति का सबसे संवेदनशील चेहरा मानते हैं।
OLDISGOLDFILMS के लिए अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ एक नेता नहीं हैं।
वे उस दौर की याद हैं,
जब भाषणों में मर्यादा थी और राजनीति में शब्दों का वजन था।
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