
11 मई 1998।
राजस्थान का तपता रेगिस्तान बिल्कुल शांत दिखाई दे रहा था।
हवा धीरे-धीरे रेत को उड़ा रही थी।
आसमान सामान्य था।
लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त थे।
लेकिन उसी शांत रेगिस्तान के नीचे ऐसा रहस्य छिपा था, जो कुछ घंटों बाद दुनिया की राजनीति बदलने वाला था।
किसी को अंदाजा नहीं था कि भारत इतिहास का सबसे बड़ा कदम उठाने जा रहा है।
अमेरिका के आधुनिक सैटेलाइट भी इस मिशन को पकड़ नहीं पाए थे।
और फिर दोपहर में अचानक ऐसी खबर आई, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया।
प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देश को संबोधित किया।
उनकी आवाज सामान्य थी।
लेकिन शब्दों में ऐसी ताकत थी, जिसने दुनिया की नींद उड़ा दी।
उन्होंने कहा, “भारत ने आज तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए हैं।”
बस इतना सुनना था।
पूरी दुनिया समझ गई कि भारत अब बदल चुका है।
पोखरण की रेत में पहले भी दफन हो चुका था इतिहास
पोखरण का नाम भारत के इतिहास में पहले भी दर्ज हो चुका था।
1974 में भारत ने पहला परमाणु परीक्षण किया था।
उस समय दुनिया ने भारत को गंभीरता से लेना शुरू किया था।
लेकिन 1998 का परीक्षण बिल्कुल अलग था।
इस बार भारत केवल विज्ञान नहीं दिखा रहा था।
भारत अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखा रहा था।
यह फैसला अचानक नहीं लिया गया था।
इसके पीछे कई दशकों की चिंता और बहस थी।
1964 में चीन ने परमाणु परीक्षण किया था।
उसके बाद भारत के रणनीतिक विशेषज्ञ लगातार चिंतित रहने लगे।
सवाल यह था कि अगर पड़ोसी देशों के पास परमाणु हथियार हों, तो क्या भारत सुरक्षित रह सकता है?
यही सवाल धीरे-धीरे पोखरण-II की नींव बन गया।
देश के कई विशेषज्ञ मानते थे कि दुनिया केवल शांति की भाषा नहीं समझती।
दुनिया ताकत की भाषा भी समझती है।
एक सोच जिसने भारत की दिशा बदल दी
भारत के प्रसिद्ध रणनीतिक विशेषज्ञ K. Subrahmanyam अक्सर कहा करते थे कि परमाणु शक्ति केवल युद्ध का हथियार नहीं होती।
वह दुनिया में सम्मान दिलाती है।
उनका मानना था कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति ताकत के संतुलन पर चलती है।
जिस देश के पास तकनीक और सामरिक शक्ति होती है, उसी की बात सुनी जाती है।
भारत लंबे समय तक उस व्यवस्था से नाराज़ रहा, जिसमें कुछ देशों को परमाणु हथियार रखने की अनुमति थी और बाकी देशों को रोका जाता था।
भारत इसे बराबरी का नियम नहीं मानता था।
इसी कारण पोखरण-II केवल एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं था।
यह भारत की पहचान का ऐलान था।
भारत दुनिया को बताना चाहता था कि वह अपने फैसले खुद ले सकता है।
यही सोच आगे चलकर भारत की नई विदेश नीति की ताकत बनी।
नई सरकार और सबसे बड़ा जोखिम
मार्च 1998 में नई सरकार बनी थी।
अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे।
सरकार गठबंधन पर टिकी थी।
करीब 41 दल साथ थे।
राजनीतिक स्थिरता भी पूरी तरह मजबूत नहीं थी।
फिर भी कुछ ही हफ्तों में इतना बड़ा फैसला ले लिया गया।
जोखिम बहुत बड़ा था।
भारत जानता था कि अमेरिका और कई पश्चिमी देश नाराज़ होंगे।
आर्थिक प्रतिबंध लग सकते थे।
विदेशी निवेश प्रभावित हो सकता था।
लेकिन फिर भी सरकार पीछे नहीं हटी।
उस समय भारत की अर्थव्यवस्था आज जितनी मजबूत नहीं थी।
फिर भी फैसला लिया गया।
यही कारण है कि पोखरण-II को केवल वैज्ञानिक सफलता कहना अधूरा होगा।
यह राजनीतिक साहस की भी कहानी थी।
एक ऐसा फैसला, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया।
कैसे दुनिया की नजरों से बचा भारत?
पोखरण-II की सबसे दिलचस्प बात उसकी गोपनीयता थी।
भारत ने इस मिशन को इतनी चुपचाप अंजाम दिया कि दुनिया की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसियां भी भ्रमित हो गईं।
वैज्ञानिक रात में काम करते थे।
दिन में गतिविधियां सामान्य रखी जाती थीं।
सेना ने पूरे इलाके को सामान्य सैन्य क्षेत्र जैसा दिखाया।
वैज्ञानिकों को अलग-अलग पहचान दी गई।
कई बार वे सैनिकों के कपड़ों में आते-जाते थे।
यहां तक कि परीक्षण स्थल को ऊपर से पहचानना भी मुश्किल बना दिया गया था।
अमेरिका के जासूसी सैटेलाइट लगातार भारत पर नजर रख रहे थे।
फिर भी वे असली तैयारी पकड़ नहीं पाए।
इस मिशन में डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम की भूमिका बेहद अहम थी।
उन्होंने पूरी टीम को चुपचाप नेतृत्व दिया।
जब दुनिया को सच्चाई पता चली, तब तक परीक्षण पूरे हो चुके थे।
यही कारण है कि पोखरण-II को भारत के सबसे सफल गुप्त अभियानों में गिना जाता है।
दुनिया हिल गई, लेकिन भारत नहीं झुका
परमाणु परीक्षण के तुरंत बाद दुनिया में हलचल मच गई।
अमेरिका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने आलोचना की।
कई देशों ने भारत को अलग-थलग करने की कोशिश की।
दुनिया को लगा कि भारत आर्थिक संकट में फंस जाएगा।
लेकिन भारत झुका नहीं।
देश ने दबाव सहा।
फिर भी अपने फैसले पर कायम रहा।
धीरे-धीरे वही देश भारत से रिश्ते सुधारने लगे।
कुछ साल बाद भारत को जिम्मेदार परमाणु शक्ति माना जाने लगा।
यही भारत की सबसे बड़ी जीत थी।
भारत ने दुनिया को दिखाया कि आत्मविश्वास और धैर्य से बड़ी चुनौतियों का सामना किया जा सकता है।
यह वही दौर था, जिसने भारत की वैश्विक छवि बदलनी शुरू की।
पाकिस्तान का जवाब और दक्षिण एशिया का नया दौर
भारत के परीक्षण के कुछ दिनों बाद पाकिस्तान ने भी चागई में परमाणु परीक्षण कर दिया।
पूरा दक्षिण एशिया अब परमाणु युग में प्रवेश कर चुका था।
उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति Bill Clinton ने पाकिस्तान को रोकने की कोशिश की थी।
लेकिन पाकिस्तान के भीतर दबाव बहुत बढ़ चुका था।
इस घटना ने दुनिया को एक बड़ा संदेश दिया।
परमाणु फैसले केवल सुरक्षा से जुड़े नहीं होते।
उनमें राजनीति, प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय भावना भी शामिल होती है।
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव पहले से मौजूद था।
लेकिन अब यह तनाव नई दिशा में बढ़ चुका था।
दुनिया की नजरें दक्षिण एशिया पर टिक गईं।
फिर भी भारत ने लगातार जिम्मेदार परमाणु नीति की बात की।
यही कारण था कि धीरे-धीरे भारत की छवि एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में बनने लगी।
“आत्मसम्मान का विस्फोट” क्यों कहा गया?
1998 में एक अखबार ने इन परीक्षणों को “आत्मसम्मान का विस्फोट” कहा था।
यह वाक्य बहुत मशहूर हो गया।
असल में भारत केवल बम नहीं फोड़ रहा था।
भारत अपने आत्मविश्वास का ऐलान कर रहा था।
सदियों तक भारत को विकासशील और कमजोर देश की नजर से देखा गया।
लेकिन पोखरण-II के बाद दुनिया का नजरिया बदलने लगा।
भारत ने दिखाया कि वह दबाव में फैसले बदलने वाला देश नहीं है।
भारत अपनी शर्तों पर दुनिया से बात करना चाहता था।
यही भावना देश के करोड़ों लोगों के भीतर गर्व बनकर उभरी।
लोगों को लगा कि भारत अब केवल सुनने वाला देश नहीं रहा।
भारत अब अपनी आवाज दुनिया तक पहुंचाने लगा है।
आज का भारत उसी सोच पर आगे बढ़ रहा है
11 मई अब केवल परमाणु परीक्षण की तारीख नहीं है।
इसे राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
आज भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
भारत अंतरिक्ष तकनीक में भी दुनिया को चौंका रहा है।
देश दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है।
पेटेंट फाइलिंग लगातार बढ़ रही है।
सरकार रिसर्च और इनोवेशन पर बड़े निवेश की योजना बना रही है।
भारत अब केवल विदेशी तकनीक खरीदना नहीं चाहता।
भारत अपनी तकनीक खुद बनाना चाहता है।
यही पोखरण-II की सबसे बड़ी विरासत है।
उस दिन जो आत्मविश्वास पैदा हुआ था, वही आज नए भारत की पहचान बन चुका है।
ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का सपना आज भी जिंदा है
जब भी राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस की बात होती है, एक नाम जरूर याद आता है।
वह नाम है डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम।
उन्होंने युवाओं को सिखाया कि विज्ञान केवल किताबों तक सीमित नहीं होता।
विज्ञान देश का भविष्य बदल सकता है।
कलाम हमेशा आत्मनिर्भर भारत की बात करते थे।
उनका सपना था कि भारत तकनीक में दुनिया का नेतृत्व करे।
आज भारत उसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और अंतरिक्ष तकनीक में नए कदम उठाए जा रहे हैं।
भारत अब तकनीक के क्षेत्र में केवल ग्राहक नहीं बनना चाहता।
भारत निर्माता बनना चाहता है।
यही सोच पोखरण-II से मजबूत हुई थी।
11 मई सिर्फ एक तारीख नहीं
11 मई 1998 ने भारत की सोच बदल दी।
उस दिन भारत ने दुनिया को बताया कि वह केवल इतिहास नहीं, भविष्य भी बना सकता है।
पोखरण-II ने भारत को नई पहचान दी।
एक ऐसा देश, जो दबाव में झुकता नहीं।
एक ऐसा देश, जो अपने फैसले खुद लेता है।
आज भी जब 11 मई आती है, तो राजस्थान की वही रेत इतिहास की सबसे बड़ी गूंज सुनाती है।
उस दिन रेगिस्तान शांत जरूर था।
लेकिन उसी शांति के नीचे भारत का आत्मविश्वास जन्म ले रहा था।
शायद इसलिए पोखरण-II केवल एक परमाणु परीक्षण नहीं था।
वह नए भारत की शुरुआत थी।
एक ऐसा भारत, जो अब दुनिया को अपनी ताकत महसूस करवाने लगा था।
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