Skip to content
Home » जब भगत सिंह के सबसे मजबूत साथी बने सुखदेव थापर, और 23 साल की उम्र में हंसते हुए फांसी पर चढ़ गए

जब भगत सिंह के सबसे मजबूत साथी बने सुखदेव थापर, और 23 साल की उम्र में हंसते हुए फांसी पर चढ़ गए

जब भगत सिंह के सबसे मजबूत साथी बने सुखदेव थापर, और 23 साल की उम्र में हंसते हुए फांसी पर चढ़ गए
जब भगत सिंह के सबसे मजबूत साथी बने सुखदेव थापर, और 23 साल की उम्र में हंसते हुए फांसी पर चढ़ गए

भारतीय सिनेमा में कई नाम अमर हुए।
लेकिन कुछ चेहरे ऐसे रहे, जिन्हें समय ने उतनी जगह नहीं दी।
ऐसा ही एक नाम था Sukhdev Thapar।
एक ऐसा नौजवान, जिसने 23 साल की उम्र में हंसते हुए फांसी स्वीकार कर ली।

आज भी जब Bhagat Singh का नाम लिया जाता है, तब उनके साथ खड़े उस साथी को लोग भूल जाते हैं।
पर सच यह है कि क्रांति की पूरी रणनीति में सुखदेव की भूमिका बेहद बड़ी थी।
वो केवल क्रांतिकारी नहीं थे।
वो सोच थे, संगठन थे और युवाओं की आवाज थे।

उनकी जिंदगी जितनी छोटी थी, उतनी ही प्रेरणादायक भी थी।
OLDISGOLDFILMS आज आपको उस वीर की कहानी बताएगा, जिसने अपनी जवानी देश के नाम कर दी।

जन्म के तीन महीने बाद सिर से उठ गया पिता का साया

सुखदेव थापर का जन्म 15 मई 1907 को Lyalpur में हुआ था।
आज यह इलाका पाकिस्तान में है।

उनके पिता का नाम रामलाल थापर था।
माता का नाम रल्ली देवी था।
लेकिन किस्मत ने बचपन में ही कठिन परीक्षा ले ली।

जन्म के केवल तीन महीने बाद पिता का निधन हो गया।
इसके बाद उनका पालन-पोषण ताऊ अचिंतराम ने किया।

अचिंतराम आर्य समाज से प्रभावित थे।
इसी कारण घर में देशभक्ति और समाज सेवा का माहौल था।

सुखदेव बचपन से ही गंभीर स्वभाव के थे।
वो खेलकूद से ज्यादा देश की हालत पर सोचते थे।
धीरे-धीरे उनके भीतर अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा बढ़ने लगा।

जलियांवाला बाग ने बदल दी एक मासूम बच्चे की सोच

1919 का Jallianwala Bagh Massacre पूरे देश को झकझोर चुका था।
उस समय सुखदेव केवल 12 साल के थे।

लेकिन उस घटना ने उनके मन पर गहरा असर डाला।
उन्होंने पहली बार अंग्रेजी शासन की क्रूरता को समझा।

चारों तरफ चीखें थीं।
देश में डर का माहौल था।
लेकिन कुछ युवाओं के भीतर आग जल चुकी थी।
उसी आग ने आगे चलकर क्रांति को जन्म दिया।

सुखदेव अक्सर कहते थे कि गुलामी केवल शरीर की नहीं होती।
विचारों की गुलामी उससे भी खतरनाक होती है।

यही सोच उन्हें सामान्य युवाओं से अलग बनाती थी।
धीरे-धीरे उन्होंने तय कर लिया कि उनका जीवन अब केवल देश के लिए होगा।

लाहौर कॉलेज में हुई भगत सिंह से मुलाकात

साल 1922 में उन्होंने National College Lahore में प्रवेश लिया।
यहीं उनकी मुलाकात भगत सिंह से हुई।

दोनों की सोच एक जैसी थी।
दोनों अंग्रेजों से नफरत करते थे।
दोनों भारत को आजाद देखना चाहते थे।

इसी कारण उनकी दोस्ती बहुत जल्दी गहरी हो गई।

कॉलेज के दिनों में दोनों घंटों बैठकर क्रांति की योजनाएं बनाते थे।
वे किताबें पढ़ते थे।
विदेशी आंदोलनों का अध्ययन करते थे।

यहीं से एक नए क्रांतिकारी दौर की शुरुआत हुई।

बहुत कम लोग जानते हैं कि संगठन बनाने में सुखदेव की भूमिका सबसे मजबूत थी।
वो युवाओं को जोड़ने में माहिर थे।
उनकी बातों में ऐसा प्रभाव था कि लोग तुरंत प्रेरित हो जाते थे।

नौजवान भारत सभा ने युवाओं में भर दी क्रांति की आग

1926 में सुखदेव, भगत सिंह और Bhagwati Charan Vohra ने मिलकर “नौजवान भारत सभा” बनाई।

इस संगठन का उद्देश्य युवाओं को जागरूक करना था।
वे लोगों को देशभक्ति का मतलब समझाते थे।

सभा में स्वदेशी वस्तुओं पर जोर दिया जाता था।
भारतीय संस्कृति की चर्चा होती थी।
साथ ही शारीरिक व्यायाम और अनुशासन सिखाया जाता था।

लेकिन इसके पीछे असली मकसद युवाओं को क्रांति के लिए तैयार करना था।

धीरे-धीरे यह संगठन पंजाब में लोकप्रिय हो गया।
अंग्रेज सरकार भी इस बढ़ती ताकत से डरने लगी।

सुखदेव इस संगठन के मुख्य रणनीतिकार माने जाते थे।
वो पर्दे के पीछे रहकर योजनाएं बनाते थे।
यही कारण था कि अंग्रेज उन्हें बेहद खतरनाक मानते थे।

लाला लाजपत राय की मौत ने बदल दी पूरी कहानी

1928 में Simon Commission Protest के खिलाफ पूरे देश में विरोध हुआ।

Lala Lajpat Rai लाहौर में प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे।
तभी अंग्रेज पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बेरहमी से लाठीचार्ज किया।

इस हमले में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए।
कुछ दिनों बाद उनका निधन हो गया।

इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया।

सुखदेव यह अपमान सहन नहीं कर सके।
उन्होंने भगत सिंह और Shivaram Rajguru के साथ बदला लेने की योजना बनाई।

उनका लक्ष्य पुलिस अधिकारी स्कॉट था।
लेकिन गलती से गोली जे.पी. सांडर्स को लग गई।

इसके बाद अंग्रेज सरकार बुरी तरह बौखला गई।
पूरे पंजाब में क्रांतिकारियों की तलाश शुरू हो गई।

जेल में भी नहीं टूटा सुखदेव का हौसला

15 अप्रैल 1929 को सुखदेव को गिरफ्तार कर लिया गया।
उन्हें Lahore Central Jail में रखा गया।

जेल में भारतीय कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार होता था।
खाना बेहद खराब दिया जाता था।
अंग्रेज अफसर भारतीयों को अपमानित करते थे।

इसके खिलाफ सुखदेव ने आवाज उठाई।
उन्होंने अन्य क्रांतिकारियों के साथ भूख हड़ताल शुरू कर दी।

यह हड़ताल 63 दिनों तक चली।
इस दौरान Jatindra Nath Das शहीद हो गए।

लेकिन सुखदेव पीछे नहीं हटे।
जेल की सलाखों के पीछे भी उनकी आवाज गूंजती रही।

वो साथी कैदियों का हौसला बढ़ाते थे।
“मेरा रंग दे बसंती चोला” जैसे गीत जेल में गूंजते थे।

अंग्रेज सरकार समझ चुकी थी कि ये युवा डरने वाले नहीं हैं।

गांधीजी को लिखा गया वो पत्र, जिसने सबको चौंका दिया

बहुत कम लोग जानते हैं कि सुखदेव ने जेल से Mahatma Gandhi को पत्र लिखा था।

उस समय गांधी-इरविन समझौते की चर्चा चल रही थी।
देशभर में लोग उम्मीद कर रहे थे कि शायद इन क्रांतिकारियों की सजा माफ हो जाएगी।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

सुखदेव ने अपने पत्र में कई तीखे सवाल पूछे।
उन्होंने लिखा कि यदि क्रांतिकारियों की मदद नहीं कर सकते, तो उनके खिलाफ माहौल भी न बनाएं।

यह पत्र बाद में “यंग इंडिया” में प्रकाशित हुआ।
इस पत्र ने देशभर में नई बहस छेड़ दी।

लोग समझने लगे कि क्रांतिकारी केवल हथियार नहीं उठाते थे।
उनकी विचारधारा भी बेहद मजबूत थी।

सुखदेव की भाषा में गुस्सा भी था और दर्द भी।

फांसी से पहले अंग्रेजों ने क्यों बदल दिया समय?

अंग्रेज सरकार को डर था कि यदि तय तारीख पर फांसी हुई, तो देशभर में विद्रोह भड़क सकता है।

इसी कारण उन्होंने चुपचाप योजना बदल दी।
24 मार्च की जगह 23 मार्च 1931 की शाम को ही फांसी दे दी गई।

लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव थापर को एक साथ फांसी पर लटका दिया गया।

कहा जाता है कि तीनों हंसते हुए फांसीघर की ओर बढ़े थे।
उनके चेहरे पर डर नहीं था।
उनकी आंखों में केवल आजाद भारत का सपना था।

अंग्रेजों ने शवों को परिवार को भी नहीं सौंपा।
रात में सतलुज नदी किनारे गुप्त तरीके से अंतिम संस्कार कर दिया गया।

लेकिन तब तक पूरा देश जाग चुका था।

मौत के बाद भी जिंदा रहा एक क्रांतिकारी

आज भी 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाता है।
Hussainiwala National Martyrs Memorial पर लाखों लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।

Shaheed Sukhdev College of Business Studies भी उनके नाम पर है।

लेकिन सबसे बड़ी श्रद्धांजलि वो भावना है, जो आज भी युवाओं के दिल में जिंदा है।

सुखदेव ने साबित किया कि देशभक्ति उम्र नहीं देखती।
23 साल की जिंदगी में उन्होंने वो कर दिखाया, जिसे लोग सदियों तक याद रखेंगे।

उनकी कहानी केवल इतिहास नहीं है।
वो आज भी हर भारतीय युवा के लिए प्रेरणा है।

OLDISGOLDFILMS ऐसे अमर वीर को नमन करता है।

#SukhdevThapar #BhagatSingh #Rajguru #IndianFreedomFighters #OLDISGOLDFILMS