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जब ‘लारा लप्पा’ पूरे देश की जुबान पर था, लेकिन उसका संगीतकार गुमनामी में खो गया

जब ‘लारा लप्पा’ पूरे देश की जुबान पर था, लेकिन उसका संगीतकार गुमनामी में खो गया
जब ‘लारा लप्पा’ पूरे देश की जुबान पर था, लेकिन उसका संगीतकार गुमनामी में खो गया

हिंदी सिनेमा का इतिहास ऐसे कई कलाकारों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अनमोल रचनाएँ दीं, लेकिन समय के साथ खुद इतिहास के पन्नों में खो गए।

ऐसा ही एक नाम था विनोद

आज भी जब “लारा लप्पा लारा लप्पा लाई रखदा” कानों में गूंजता है, तो लोग झूम उठते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस सदाबहार गीत के पीछे एक ऐसे संगीतकार का हाथ था, जिसे वह सम्मान कभी नहीं मिला जिसका वह हकदार था।

यह कहानी केवल एक संगीतकार की नहीं है।

यह कहानी प्रतिभा, संघर्ष, सफलता और दर्दनाक अंत की भी है।


एरिक रॉबर्ट्स से विनोद बनने तक का सफर

28 मई 1922 को लाहौर में जन्मे एरिक रॉबर्ट्स एक पंजाबी ईसाई परिवार से थे।

बचपन से ही संगीत उनके दिल में बस चुका था। जब आसपास शादियों में बैंड बजते थे, तो छोटे एरिक घंटों खड़े होकर उन्हें सुनते रहते थे। गुरुद्वारों में होने वाले शबद-कीर्तन भी उन्हें आकर्षित करते थे।

संगीत उनके लिए केवल मनोरंजन नहीं था। वह उनकी आत्मा का हिस्सा बन चुका था।

बाद में उन्होंने लाहौर के प्रसिद्ध संगीतकार पंडित अमरनाथ से संगीत की शिक्षा ली। यहीं से उनकी प्रतिभा को दिशा मिली।

कहा जाता है कि उन्होंने रागों और धुनों की बारीकियाँ इतनी गहराई से सीखीं कि कम उम्र में ही अपनी अलग पहचान बना ली।

फिल्म उद्योग में आने पर उन्हें नया नाम मिला—विनोद

यही नाम आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।


17 साल की उम्र में शुरू हो गया था संगीत का जादू

सिर्फ 17 वर्ष की उम्र में उनकी पहली रिकॉर्डेड रचना रिलीज हुई।

यह उस दौर की बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी।

धीरे-धीरे लाहौर की फिल्म दुनिया में उनका नाम फैलने लगा। संगीत की समझ और नई धुनें बनाने की क्षमता उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी।

1946 तक उन्होंने फिल्मों के लिए संगीत देना शुरू कर दिया।

उनके शुरुआती प्रोजेक्ट्स में “खामोश निगाहें”, “पराये बस में” और “कामिनी” जैसी फिल्में शामिल थीं।

हालांकि ये फिल्में बड़ी सफलता नहीं बन सकीं, लेकिन फिल्म जगत ने उनकी प्रतिभा को नोटिस करना शुरू कर दिया था।


लता मंगेशकर और विनोद का खास रिश्ता

संगीतकार मास्टर गुलाम हैदर ने एक दिन युवा लता मंगेशकर को विनोद से मिलवाया।

यह मुलाकात आगे चलकर बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई।

विनोद ने अपनी पंजाबी फिल्म “चमन” में लता को गाने का मौका दिया। उस समय लता का करियर अभी शुरुआती दौर में था।

फिल्म भले बड़ी हिट न रही हो, लेकिन उसके गीतों ने संगीत प्रेमियों का ध्यान खींचा।

यही वह समय था जब विनोद और लता की जोड़ी ने कई यादगार गीतों को जन्म दिया।

बाद में यही लता मंगेशकर भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी गायिका बनीं।


एक गीत जिसने पूरे देश को झुमा दिया

1949 में रिलीज हुई फिल्म “एक थी लड़की” ने विनोद की किस्मत बदल दी।

इस फिल्म का गीत “लारा लप्पा लारा लप्पा लाई रखदा” देखते ही देखते पूरे देश में लोकप्रिय हो गया।

मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज़ ने इस गीत को अमर बना दिया।

दिलचस्प बात यह है कि यह धुन एक पारंपरिक पहाड़ी और पंजाबी लोकधुन से प्रेरित थी।

विनोद ने उसे आधुनिक अंदाज में ढाला।

परिणाम ऐसा निकला कि सात दशक बाद भी यह गीत लोगों की जुबान पर है।

रियलिटी शो हों या स्टेज प्रोग्राम, यह गीत आज भी दर्शकों को उत्साहित कर देता है।


मुंबई पहुंचे, लेकिन किस्मत साथ नहीं आई

“एक थी लड़की” की सफलता के बाद निर्माता रूप के. शोरी अपनी टीम के साथ मुंबई आ गए।

विनोद भी उनके साथ पहुंचे।

यहां उन्हें कई फिल्मों में संगीत देने का मौका मिला।

उन्होंने हिंदी और पंजाबी मिलाकर लगभग 36 फिल्मों में संगीत दिया।

उनकी खासियत यह थी कि वे पंजाबी फिल्मों में हिंदी गीत और हिंदी films में पंजाबी रंग भर देते थे।

यह प्रयोग उस दौर में बहुत नया था।

उनके संगीत में लोकधुनों की मिठास और शास्त्रीयता का संतुलन दिखाई देता था।


जिन धुनों को लोग पसंद करते रहे, लेकिन नाम भूल गए

विनोद ने “अनमोल रतन”, “वफ़ा”, “सब्ज बाग”, “आग का दरिया”, “लाडला” और “मक्खीचूस” जैसी फिल्मों में संगीत दिया।

“जब किसी के रुख पे जुल्फें”,

“याद आने वाले फिर याद आ रहे हैं”,

“शिकवा तेरा मैं गाऊँ”,

“अब हाल-ए-दिल” और

“आंखियां मिला के” जैसे गीत उनकी प्रतिभा का प्रमाण हैं।

आज भी जब इन गीतों को सुना जाता है, तो महसूस होता है कि वे अपने समय से आगे के संगीतकार थे।

लेकिन दुर्भाग्य से उनकी अधिकांश फिल्में छोटे बैनरों के अंतर्गत बनीं।

फिल्मों की असफलता का असर उनके संगीत पर भी पड़ा।

बेहतरीन धुनें भी वह पहचान नहीं पा सकीं जिसकी वे हकदार थीं।


आखिर क्यों पीछे रह गए विनोद?

उस दौर में नौशाद, सी. रामचंद्र, अनिल बिस्वास और बाद में शंकर-जयकिशन जैसे बड़े नाम उद्योग पर छाए हुए थे।

इन संगीतकारों के पास बड़े निर्माता और बड़े बैनर थे।

विनोद के पास ऐसी कोई मजबूत लॉबी नहीं थी।

उनकी प्रतिभा किसी से कम नहीं थी।

लेकिन फिल्म उद्योग केवल प्रतिभा से नहीं चलता।

यहां भाग्य, संपर्क और अवसर भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।

शायद यही कारण था कि इतने अच्छे संगीतकार होने के बावजूद वे वह मुकाम नहीं हासिल कर सके जिसके वे अधिकारी थे।


गरीबी और संघर्ष ने घेर लिया

1950 के दशक में विनोद साल में एक या दो सफल फिल्में दे रहे थे।

लेकिन मुंबई जैसे शहर में यह पर्याप्त नहीं था।

आर्थिक परेशानियां लगातार बढ़ती रहीं।

वे एक सच्चे पंजाबी कलाकार थे और पंजाबी फिल्मों के लिए संगीत बनाना चाहते थे।

मगर धीरे-धीरे उस क्षेत्र में भी अवसर कम होते गए।

उनकी आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती गई।

कई बार उन्हें अपनी प्रतिभा के अनुरूप काम भी नहीं मिला।

यह विडंबना थी कि जिनकी धुनों पर लोग झूमते थे, वही कलाकार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था।


एक मामूली कट और खत्म हो गया संगीत का सफर

25 दिसंबर 1959 का दिन भारतीय संगीत जगत के लिए दुखद साबित हुआ।

शेविंग करते समय जंग लगी ब्लेड से उनके चेहरे पर हल्का कट लग गया।

उस समय टिटनेस जैसी बीमारी का इलाज हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं था।

संक्रमण तेजी से बढ़ा।

जब तक उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया, बहुत देर हो चुकी थी।

वे कोमा में चले गए और मात्र 37 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए।

एक महान संगीतकार का जीवन इतनी साधारण और दुखद घटना के कारण समाप्त हो गया।


क्यों याद रखा जाना चाहिए विनोद को?

आज जब हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम युग की चर्चा होती है, तो कई बड़े नाम सामने आते हैं।

लेकिन विनोद जैसे कलाकार अक्सर पीछे छूट जाते हैं।

उनकी धुनों में पंजाब की मिट्टी की खुशबू थी।

उनकी रचनाओं में लोकसंगीत की आत्मा थी।

उनकी धुनें सरल थीं, लेकिन दिल में उतर जाती थीं।

“लारा लप्पा” केवल एक गीत नहीं है।

वह उस कलाकार की पहचान है जिसने भारतीय संगीत को एक नया रंग दिया।

शायद समय आ गया है कि हम इस भूले-बिसरे संगीतकार को फिर से याद करें और उनकी धुनों को नई पीढ़ी तक पहुंचाएं।

यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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