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गोविंद नामदेव: 250 रुपये की छात्रवृत्ति से हिंदी सिनेमा के खतरनाक विलेन तक, संघर्ष की पूरी कहानी

Govind Namdev Story  From ₹250 Scholarship to Bollywood’s Iconic Villain
Govind Namdev Story From ₹250 Scholarship to Bollywood’s Iconic Villain

कभी-कभी जिंदगी जिस रास्ते पर ले जाती है, वह हमारे सपनों से बिल्कुल अलग होता है। एक लड़का था, जिसे बचपन में यह भी नहीं पता था कि एक दिन उसका चेहरा हिंदी सिनेमा के खतरनाक किरदारों से पहचाना जाएगा। उसके पिता भगवान की मूर्तियों के कपड़े सिलते थे। घर में रामायण गाई जाती थी। बेटा मंजीरा बजाता था। फिर एक दिन वही लड़का अपना घर छोड़कर दिल्ली पहुंच गया। उसके पास कोई फिल्मी पहचान नहीं थी। कोई बड़ा सहारा नहीं था। बस कुछ बड़ा करने की बेचैनी थी। और शायद यही बेचैनी आगे चलकर उसे उस मुकाम तक ले गई, जहां उसका नाम आते ही दर्शकों को एक खास तरह का खौफ याद आने लगा। यह कहानी है अभिनेता गोविंद नामदेव की।

जिस घर में रामायण गूंजती थी, वहीं अभिनय का पहला बीज पड़ा

मध्य प्रदेश के सागर में गोविंद नामदेव का बचपन बीता। उनका परिवार साधारण जीवन जीता था। उनके पिता श्रीराम प्रसाद भगवान की मूर्तियों के कपड़े सिलने का पुश्तैनी काम करते थे। इसके साथ ही वे रामायण का पाठ और गायन भी करते थे। घर का माहौल धार्मिक और सांस्कृतिक था। गोविंद भी पिता के साथ बैठते थे। वे मंजीरा बजाते थे और रामायण के गायन में साथ देते थे। शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही बच्चा आगे चलकर संवादों और किरदारों से लाखों लोगों को प्रभावित करेगा। अभिनय की औपचारिक शुरुआत बहुत बाद में हुई। लेकिन मंच पर खड़े होने का आत्मविश्वास शायद उसी माहौल में कहीं जन्म ले चुका था।

आठवीं कक्षा में पढ़ा गांधी का जीवन, फिर बदल गया सोचने का तरीका

गोविंद नामदेव के जीवन में एक और घटना बेहद महत्वपूर्ण रही। उन्होंने महात्मा गांधी की जीवनी पढ़ी। किताब के पन्नों से उन्हें सिर्फ गांधी के बारे में जानकारी नहीं मिली। उनके भीतर महान लोगों के जीवन को समझने की इच्छा पैदा हो गई। इसके बाद उन्होंने सरोजिनी नायडू और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसी विभूतियों की जीवनियां भी पढ़ीं। वह उम्र छोटी थी। लेकिन सपने बहुत बड़े हो चुके थे। उन्हें लगने लगा था कि अगर जीवन में कुछ अलग करना है, तो सीमित दायरे से बाहर निकलना होगा। दिल्ली उन्हें उस समय संभावनाओं का शहर दिखाई देती थी। इसलिए उन्होंने अपने भविष्य के लिए बड़ा फैसला लिया। पढ़ाई के शुरुआती दौर में ही वह दिल्ली आ गए।

दिल्ली पहुंचकर साबित किया कि हालात मंजिल तय नहीं करते

दिल्ली उनके लिए आसान जगह नहीं थी। नया शहर था। नया माहौल था। सुविधाएं सीमित थीं। लेकिन पढ़ाई के प्रति उनका जुनून कम नहीं हुआ। उन्होंने आठवीं कक्षा की परीक्षा में शानदार प्रदर्शन किया। बताया जाता है कि उन्होंने दिल्ली के 14 स्कूलों वाले जोन में शीर्ष स्थान हासिल किया। इसके बाद उन्हें छात्रवृत्ति मिली। यही छात्रवृत्ति आगे की पढ़ाई में उनके लिए बड़ा सहारा बनी। आर्थिक सीमाएं थीं। मगर पढ़ाई नहीं रुकी। उन्होंने धीरे-धीरे यह साबित किया कि प्रतिभा को सिर्फ महंगे साधनों की जरूरत नहीं होती। सही अवसर मिलने पर मेहनत भी रास्ता बना सकती है।

फिर आया वह विज्ञापन, जिसमें सिर्फ 250 रुपये ने जिंदगी बदल दी

कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया, जब गोविंद 11वीं कक्षा में थे। वह नौकरी करने के बारे में सोच रहे थे। तभी उनकी नजर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से जुड़े एक विज्ञापन पर पड़ी। उसमें छात्रवृत्ति के रूप में 250 रुपये का उल्लेख था। आज यह रकम मामूली लग सकती है। लेकिन उस दौर में यह उनके लिए पढ़ाई जारी रखने का महत्वपूर्ण जरिया बन सकती थी। उन्हें लगा कि यहां शिक्षा भी मिलेगी और कुछ नया सीखने का मौका भी। उन्होंने आवेदन किया। उनका चयन हो गया। यहीं से उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया। उन्हें अभिनय की दुनिया में प्रवेश का रास्ता मिला। हालांकि उस समय भी उनका लक्ष्य सिर्फ अभिनेता बनना नहीं था। वह खुद को बेहतर बनाना चाहते थे।

एक ही क्लास में बैठे थे भविष्य के कई बड़े नाम

नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने गोविंद नामदेव को सिर्फ अभिनय नहीं सिखाया। वहां उन्होंने रंगमंच की गहराई को समझा। इसी दौर में उनके साथ अनुपम खेर और सतीश कौशिक जैसे कलाकार भी जुड़े रहे। थिएटर ने उनके अभिनय को मजबूत बनाया। संवाद बोलने से ज्यादा जरूरी था संवाद को समझना। चेहरे के भावों से कहानी कहना जरूरी था। शरीर की भाषा पर नियंत्रण जरूरी था। मंच पर हर गलती तुरंत दिखाई देती थी। इसलिए वहां मिला प्रशिक्षण आगे चलकर फिल्मों में उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बना। 1978 में NSD से निकलने के बाद उन्होंने तुरंत फिल्मों की ओर भागने के बजाय खुद को और तराशने का रास्ता चुना।

मुंबई जाने की जल्दी नहीं थी, क्योंकि उन्हें पता था कि वह अभी तैयार नहीं हैं

उनके कई साथी मुंबई चले गए। मगर गोविंद नामदेव ने अलग फैसला लिया। उन्हें महसूस हुआ कि अभी उन्हें और सीखना है। उन्होंने थिएटर को अपना रास्ता बनाया। इसके बाद उन्होंने लंबे समय तक रंगमंच किया। उनके अभिनय ने उन्हें देश और विदेश के मंचों तक पहुंचाया। जर्मनी, पोलैंड और लंदन तक उनके नाटकों के शो हुए। लगभग एक दशक से अधिक समय तक रंगमंच से जुड़े रहने ने उन्हें ऐसा कलाकार बना दिया, जिसे कैमरे के सामने अभिनय करने के लिए सिर्फ संवाद याद करने की जरूरत नहीं थी। वह किरदार की मानसिकता समझने लगे थे। यही प्रशिक्षण आगे उनकी फिल्मी पहचान की सबसे मजबूत नींव बना।

802 रुपये की नौकरी से लेकर फिल्मों की दुनिया तक

संघर्ष के दिनों में उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की एकेडमी में नौकरी भी शुरू की। बताया जाता है कि 1979 में उन्हें लगभग 802 रुपये महीने की नौकरी मिली। यह वह दौर था, जब करियर की कोई गारंटी नहीं थी। मगर इसी समय उनकी निजी जिंदगी में भी एक नया अध्याय शुरू हुआ। 1980 में उनकी मुलाकात सुधा से हुई। धीरे-धीरे दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं। अगले वर्ष 1981 में दोनों जीवनसाथी बन गए। दूसरी तरफ गोविंद लगातार अभिनय और रंगमंच में अपनी जगह मजबूत कर रहे थे। जिंदगी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। लेकिन फिल्मों का बड़ा दरवाजा अभी खुलना बाकी था।

1990 में मुंबई पहुंचे और सिर्फ तीन महीने में मिल गया बड़ा मौका

आखिरकार 1990 में गोविंद नामदेव मुंबई पहुंचे। वह खाली हाथ नहीं आए थे। थिएटर के वर्षों के अनुभव को उन्होंने अपने साथ रखा। उन्होंने अपने नाटकों और अभिनय के काम को तस्वीरों और रिकॉर्डिंग के रूप में भी तैयार किया था। वह जानते थे कि मुंबई में सिर्फ प्रतिभा काफी नहीं होती। अपनी प्रतिभा दिखानी भी पड़ती है। इसी दौरान उनकी मुलाकात केतन मेहता और दूसरे फिल्म निर्माताओं से हुई। उन्हें परेश रावल के साथ केतन मेहता की फिल्म ‘सरदार पटेल’ में काम मिला। मगर उनकी पहली रिलीज होने वाली फिल्म बनी डेविड धवन की ‘शोला और शबनम’। फिल्म 1992 में रिलीज हुई। इस फिल्म में उन्होंने पुलिस अधिकारी का किरदार निभाया।

पहली पहचान पुलिस वाले के रूप में मिली, लेकिन वह उसी पहचान में फंसना नहीं चाहते थे

‘शोला और शबनम’ के बाद गोविंद नामदेव को पुलिस अधिकारी के किरदार मिलने लगे। शुरुआत में यह अवसर अच्छा लगा। लेकिन फिर उन्हें एक कलाकार की बात ने सोचने पर मजबूर कर दिया। उनके साथी महावीर शाह ने बताया कि वह कई फिल्मों में लगातार इंस्पेक्टर की भूमिका निभा चुके थे। समस्या यह थी कि उन्हें दूसरे किरदार मिलने ही बंद हो गए थे। गोविंद समझ गए कि फिल्मों में एक पहचान बनना जितना जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी है उस पहचान के कैदी न बनना। उन्होंने कई पुलिस वाले किरदारों को स्वीकार करने से इनकार किया। कुछ लोगों को उनका फैसला घमंड लगा। लेकिन गोविंद अपने करियर की दिशा खुद तय करना चाहते थे।

फिर आया वह दौर, जब विलेन ने हीरो की मौजूदगी को चुनौती देना शुरू किया

उनका इंतजार आखिरकार रंग लाया। ‘प्रेम ग्रंथ’ और ‘बैंडिट क्वीन’ जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय की अलग पहचान बनाई। उनके चेहरे में कठोरता थी। आवाज में वजन था। आंखों में एक खास तरह की सख्ती थी। यही खूबियां नकारात्मक किरदारों में बेहद प्रभावी साबित हुईं। धीरे-धीरे वह ऐसे अभिनेता बन गए, जिन्हें देखकर दर्शक किरदार को याद रखने लगे। ‘विरासत’, ‘सत्या’, ‘सरफरोश’, ‘कच्चे धागे’, ‘मस्त’, ‘थकशक’, ‘पुकार’, ‘दम मारो दम’ और ‘ओह माय गॉड’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग रंग दिखाए। उन्होंने साबित किया कि विलेन होना उनकी सीमा नहीं थी। वह सिर्फ किसी एक तरह के किरदार के अभिनेता नहीं थे।

250 रुपये से शुरू हुई तलाश, लाखों दर्शकों की पहचान पर जाकर रुकी

गोविंद नामदेव की कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें सफलता अचानक नहीं आई। इसके पीछे वर्षों की पढ़ाई थी। रंगमंच था। आर्थिक संघर्ष था। छोटी नौकरी थी। विदेशों तक किए गए थिएटर शो थे। मुंबई आने का साहस था। और सबसे बढ़कर खुद को लगातार बेहतर बनाने की इच्छा थी। फिल्मों में उन्हें विलेन के किरदार खूब मिले। दर्शकों ने उन्हें स्वीकार भी किया। मगर उनके पीछे छिपा कलाकार हमेशा उन किरदारों से बड़ा रहा। उन्होंने पुलिस वाले, नेता, डॉक्टर, गुंडे के सहयोगी और कई दूसरे किरदार निभाए। हर बार उन्होंने खुद को दोहराने से बचने की कोशिश की।

शायद यही वजह है कि उनका सफर आज भी नई पीढ़ी के लिए सबक है

गोविंद नामदेव ने संघर्ष कर रहे कलाकारों के लिए एक सीधी बात कही है। जल्दीबाजी मत कीजिए। खुद को मांजिए। अपनी योग्यता को खुद परखिए। संवाद देखिए और उन्हें बोलना सीखिए। यह सलाह उनके अपने जीवन से निकली हुई लगती है। उन्होंने मुंबई पहुंचते ही स्टार बनने की कोशिश नहीं की। उन्होंने पहले खुद को कलाकार बनाया। फिर कैमरे के सामने आए। शायद इसी वजह से उनका अभिनय लंबे समय तक याद रहा। एक साधारण परिवार से निकला वह लड़का, जो कभी पिता के साथ रामायण में मंजीरा बजाता था, आगे चलकर हिंदी सिनेमा के सबसे पहचाने जाने वाले चरित्र अभिनेताओं में शामिल हुआ। उसकी कहानी सिर्फ एक अभिनेता की कहानी नहीं है। यह उस जिद की कहानी है, जो कहती है कि अगर सपना बड़ा है, तो रास्ता चाहे जितना लंबा हो, उसे छोड़ा नहीं जाता। यही है गोविंद नामदेव की असली विरासत। यही कहानी Old is Gold Films को उन कलाकारों तक पहुंचाती है, जिनकी जिंदगी खुद किसी फिल्म से कम नहीं रही।