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कमलापति त्रिपाठी: जब मिला प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव, फिर भी सत्ता ठुकराकर चुनी संविधान की मर्यादा

Kamlapati Tripathi Story  The Leader Who Chose Constitutional Values Over Power
Kamlapati Tripathi Story The Leader Who Chose Constitutional Values Over Power

कभी-कभी इतिहास के सबसे बड़े फैसले संसद के भीतर नहीं होते। वे किसी बंद कमरे में होते हैं। कभी किसी चिट्ठी में दर्ज होते हैं। और कभी किसी ऐसे व्यक्ति के सामने रखे जाते हैं, जिसके पास सत्ता हासिल करने का असाधारण अवसर होता है। लेकिन वह व्यक्ति सत्ता से बड़ा अपना सिद्धांत मानता है।

3 सितंबर 1905 को वाराणसी की धरती पर जन्मे पंडित कमलापति त्रिपाठी ऐसे ही राजनेता थे। पत्रकारिता से राजनीति तक उनका सफर लंबा था। स्वतंत्रता आंदोलन में जेल जाने से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और देश के रेल मंत्री बनने तक उन्होंने कई जिम्मेदारियां संभालीं। मगर उनके जीवन का एक प्रसंग आज भी भारतीय राजनीति के सबसे दिलचस्प अध्यायों में गिना जा सकता है।

यह प्रसंग उस समय का है, जब देश की राजनीति बेहद अस्थिर दौर से गुजर रही थी। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच तनाव बढ़ रहा था। सत्ता के गलियारों में वैकल्पिक सरकार की चर्चा होने लगी थी। तभी एक रात कमलापति त्रिपाठी के दरवाजे पर एक संदेश लेकर एक वरिष्ठ पत्रकार पहुंचे।

संदेश साधारण नहीं था।

उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया जा रहा था।

लेकिन कहानी का असली रोमांच प्रस्ताव में नहीं है। असली कहानी उस जवाब में है, जो कमलापति त्रिपाठी ने दिया।

वह रात जब 9 जनपथ पर पहुंचा एक असाधारण संदेश

अप्रैल 1987 की वह रात भारतीय राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के संबंधों में गंभीर तनाव पैदा हो चुका था। डाक विधेयक को लेकर दोनों के बीच मतभेद काफी गहरा गए थे।

इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में राष्ट्रपति भवन से एक संदेश बाहर आया।

राष्ट्रपति कथित तौर पर राजीव गांधी सरकार को बर्खास्त करने और वैकल्पिक सरकार बनाने की संभावना पर विचार कर रहे थे। इस संभावित सरकार के नेतृत्व के लिए जिस नाम पर विचार किया गया, वह कमलापति त्रिपाठी का था।

21 अप्रैल 1987 की देर रात एक वरिष्ठ पत्रकार 9 जनपथ स्थित उनके आवास पर पहुंचे। वह केवल मिलने नहीं आए थे। वे राष्ट्रपति का संदेश लेकर आए थे।

संदेश का सार बेहद बड़ा था।

राजीव गांधी की सरकार को हटाया जा सकता था। उसके बाद एक वैकल्पिक राष्ट्रीय सरकार बनाई जाती। इस सरकार को कुछ समय चलाने के बाद देश में चुनाव कराने की योजना थी।

और उस सरकार की कमान संभालने के लिए कमलापति त्रिपाठी से सहमति मांगी गई थी।

कल्पना कीजिए।

एक अनुभवी राजनेता के सामने देश के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता खुल रहा था। सत्ता उनके सामने थी। राजनीतिक परिस्थितियां उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दे रही थीं। लेकिन उन्होंने सत्ता को अवसर की तरह नहीं देखा।

उन्होंने इसे संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादा की कसौटी पर देखा।

जवाब ऐसा था, जिसने प्रस्ताव की पूरी दिशा बदल दी

कमलापति त्रिपाठी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

उनका तर्क बेहद स्पष्ट था। उन्होंने कहा कि ऐसा करना उनकी प्रवृत्ति और संस्कार दोनों के खिलाफ है। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के प्रति उनके मन में सम्मान था। वे उनके स्वतंत्रता संघर्ष और लंबे सार्वजनिक जीवन से परिचित थे।

लेकिन सम्मान का अर्थ संवैधानिक सिद्धांतों से समझौता नहीं था।

कमलापति त्रिपाठी ने सलाह दी कि राष्ट्रपति अपने लंबे राजनीतिक जीवन की प्रतिष्ठा को नुकसान न पहुंचाएं। उनका मानना था कि निर्वाचित बहुमत वाली सरकार को बर्खास्त करने का राष्ट्रपति के पास ऐसा अधिकार नहीं होना चाहिए।

यही वह क्षण था, जिसने इस पूरे प्रसंग को असाधारण बना दिया।

क्योंकि यहां एक राजनेता को सत्ता मिल सकती थी। फिर भी उसने सत्ता की ओर बढ़ने के बजाय संविधान की मर्यादा को चुना।

यह फैसला उस राजनीतिक संस्कृति की झलक देता है, जिसमें व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ज्यादा संस्थागत विश्वास को महत्व दिया जाता था।

लेकिन यह पहली बार नहीं था जब उन्होंने सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया

कमलापति त्रिपाठी का यह निर्णय उनके पूरे राजनीतिक जीवन से अलग घटना नहीं था।

इससे पहले भी वह सत्ता के सबसे शक्तिशाली केंद्रों से असहमति जताने का साहस दिखा चुके थे।

1980 में इंदिरा गांधी सत्ता में वापस लौटी थीं। उनकी सरकार के शुरुआती दौर में उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज पर टिप्पणी की। 24 अक्टूबर 1980 को एक प्रेस कांफ्रेंस में इंदिरा गांधी ने कई विभागों के कामकाज की सराहना की। हालांकि उन्होंने रेल विभाग के प्रदर्शन पर संतोष नहीं जताया।

उस समय कमलापति त्रिपाठी रेल मंत्री थे।

प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी से वे नाराज हुए। इसके बाद उन्होंने रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

आज के राजनीतिक माहौल में यह घटना शायद सामान्य लगे। लेकिन उस दौर को समझना जरूरी है।

इंदिरा गांधी बेहद शक्तिशाली प्रधानमंत्री थीं। उनकी राजनीतिक पकड़ मजबूत थी। ऐसे समय में उनके मंत्रिमंडल का कोई वरिष्ठ सदस्य सार्वजनिक असहमति के कारण इस्तीफा दे, यह मामूली बात नहीं थी।

और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण था उनका अपने निर्णय पर कायम रहना।

इंदिरा गांधी ने मनाने की कोशिश की, लेकिन फैसला नहीं बदला

कमलापति त्रिपाठी के इस्तीफे से इंदिरा गांधी भी दुखी थीं।

23 नवंबर 1980 को लिखे एक पत्र में उन्होंने अपनी इच्छा व्यक्त की कि त्रिपाठी मंत्रिमंडल में बने रहें। उन्होंने उनके सहयोग का उल्लेख भी किया।

कहा जाता है कि लगभग 17 दिनों तक इंदिरा गांधी ने उनसे बात करने और इस्तीफा वापस लेने की कोशिश की।

लेकिन कमलापति त्रिपाठी अपने निर्णय से पीछे नहीं हटे।

यहां उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है।

वह विरोध के लिए विरोध करने वाले नेता नहीं थे। लेकिन जब उन्हें लगता था कि कोई बात उनके सिद्धांतों के विरुद्ध है, तब पद उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं रह जाता था।

यही कारण है कि उनके राजनीतिक जीवन को केवल पदों की सूची से समझना अधूरा होगा।

उनका असली परिचय उन फैसलों में छिपा था, जहां उन्हें सत्ता और सिद्धांत में से किसी एक को चुनना पड़ा।

स्वतंत्रता आंदोलन ने बनाया था ऐसा व्यक्तित्व

कमलापति त्रिपाठी का राजनीतिक चरित्र अचानक नहीं बना था।

1920 के दशक में वह असहयोग आंदोलन से जुड़े। इसके बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी सक्रिय रहे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भूमिका रही। इस दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और जेल भी जाना पड़ा।

स्वतंत्रता आंदोलन ने उनके भीतर राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं रहने दिया।

उनके लिए राजनीति सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारी थी।

इसी दौर में पत्रकारिता भी उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी। उन्होंने हिंदी दैनिक ‘आज’ से अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। बाद में ‘संसार’ से भी जुड़े।

लेखन और राजनीति उनके जीवन में साथ-साथ चलते रहे।

इसलिए उनके व्यक्तित्व में राजनीतिक सक्रियता के साथ वैचारिकता भी दिखाई देती थी।

संविधान सभा से लेकर उत्तर प्रदेश की सत्ता तक

स्वतंत्रता के बाद उनका राजनीतिक सफर और व्यापक हुआ।

कमलापति त्रिपाठी संविधान सभा के सदस्य चुने गए। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में उन्होंने भाग लिया। भारत के नाम से जुड़े एक महत्वपूर्ण संशोधन पर उनके भाषण का उल्लेख भी मिलता है।

बाद के वर्षों में उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।

वह सूचना और सिंचाई मंत्री रहे। इसके बाद गृह, शिक्षा और सूचना जैसे विभागों की जिम्मेदारी भी संभाली। 1960 के दशक में उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में काम किया।

1969 में वह उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बने।

फिर 1971 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे।

4 अप्रैल 1971 से 12 जून 1973 तक उन्होंने राज्य का नेतृत्व किया।

उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण दौर में रहा। बाद में प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी के विद्रोह के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहा।

रेल मंत्री के रूप में भी छोड़ी अलग पहचान

कमलापति त्रिपाठी दो बार देश के रेल मंत्री बने।

पहली बार उन्होंने 1975 से 1977 तक यह जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद 1980 में थोड़े समय के लिए फिर रेल मंत्रालय संभाला।

उन्होंने चार बार रेलवे बजट प्रस्तुत किया।

उनके कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण रेल सेवाएं शुरू हुईं। इनमें साबरमती एक्सप्रेस, गंगा-कावेरी एक्सप्रेस, नीलांबरी एक्सप्रेस और तमिलनाडु एक्सप्रेस जैसी सेवाओं का उल्लेख मिलता है।

काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस भी उनके रेल मंत्री काल से जुड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है।

रेलवे के विस्तार से जुड़ी कई परियोजनाएं भी उनके कार्यकाल में आगे बढ़ीं। तेलापुर-पटानचेरु के बीच नई रेल लाइन खोली गई। पुणे में डीजल लोको शेड की शुरुआत भी उनके कार्यकाल से जोड़ी जाती है।

इसलिए रेल मंत्रालय में उनका योगदान केवल राजनीतिक पद तक सीमित नहीं था।

इंदिरा गांधी के बाद बदल गए राजनीतिक समीकरण

1980 के दशक में कमलापति त्रिपाठी कांग्रेस संगठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।

संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी ने उन्हें कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया। यह जिम्मेदारी उनके राजनीतिक कद को दर्शाती थी।

लेकिन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलीं।

राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी उनके पास आई।

यहीं से कमलापति त्रिपाठी और नई कांग्रेस नेतृत्व के बीच मतभेद उभरने लगे।

आखिरकार नवंबर 1986 में उन्होंने कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

एक बार फिर वही बात सामने आई।

पद महत्वपूर्ण था।

लेकिन सिद्धांत उससे बड़ा था।

प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव और फिर भी इंकार—यही उनकी सबसे बड़ी कहानी क्यों है?

कमलापति त्रिपाठी के जीवन में मुख्यमंत्री का पद आया। रेल मंत्री का पद आया। कांग्रेस संगठन में शीर्ष जिम्मेदारियां आईं। वह संविधान सभा के सदस्य रहे। स्वतंत्रता आंदोलन में जेल गए। लेखक और पत्रकार के रूप में भी अपनी पहचान बनाई।

लेकिन इतिहास कभी-कभी किसी व्यक्ति को उसके हासिल किए हुए पदों से नहीं, बल्कि ठुकराए हुए अवसरों से याद करता है।

प्रधानमंत्री पद का वह प्रस्ताव भी ऐसा ही एक अवसर था।

अगर वह चाहते तो उस राजनीतिक संकट को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उन्होंने राष्ट्रपति के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए संवैधानिक व्यवस्था की मर्यादा की बात की।

यही विरोधाभास उनके व्यक्तित्व को खास बनाता है।

एक तरफ वह सत्ता के शीर्ष तक पहुंच चुके थे। दूसरी तरफ सत्ता हासिल करने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दरकिनार करने को तैयार नहीं थे।

एक ऐसा राजनेता, जिसकी राजनीति में विचार भी थे और विराम भी

कमलापति त्रिपाठी का जीवन केवल राजनीतिक घटनाओं का सिलसिला नहीं था।

वह लेखक भी थे। उन्होंने गांधी और मानवता जैसे विषयों पर लिखा। ‘बापू और भारत’, ‘बापू और मानवता’, ‘बंदी की चेतना’ और ‘Freedom Movement and Afterwards’ जैसी रचनाएं उनके वैचारिक संसार की झलक देती हैं।

गांधीवादी विचारों का प्रभाव उनके लेखन और सार्वजनिक जीवन दोनों में दिखाई देता था।

उनकी राजनीति में संघर्ष था। लेकिन संघर्ष के साथ आत्मसंयम भी था।

उनकी महत्वाकांक्षा थी। लेकिन उसके ऊपर मर्यादा थी।

उनके पास सत्ता थी। लेकिन सत्ता से ऊपर विश्वास था।

और शायद इसी वजह से उनकी कहानी आज भी पूछती है—

जब प्रधानमंत्री बनने का रास्ता सामने खुला हो, तब कितने लोग उस रास्ते को केवल इसलिए ठुकरा सकते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वह रास्ता संविधान की मर्यादा से होकर नहीं गुजरता?

8 अक्टूबर 1990 को वाराणसी में कमलापति त्रिपाठी का निधन हुआ।

लेकिन उनका राजनीतिक जीवन एक सवाल छोड़ गया।

राजनीति में सफलता आखिर किसे कहा जाए?

पद हासिल करना?

सत्ता में बने रहना?

या फिर वह क्षण, जब सबसे बड़ा पद सामने हो और व्यक्ति कहे—

“नहीं, यह मेरे संस्कारों और मेरे विश्वास के विरुद्ध है।”

कमलापति त्रिपाठी की कहानी इसी सवाल के साथ इतिहास के पन्नों में दर्ज है।

और शायद यही कारण है कि उनका जन्मदिन केवल एक राजनेता को याद करने का अवसर नहीं है। यह उस राजनीतिक दौर को याद करने का अवसर भी है, जब असहमति के बावजूद संबंध बचाए जाते थे और सत्ता के सामने भी संवैधानिक मर्यादा की बात की जाती थी।

Old is Gold Films ऐसी ही भूली-बिसरी राजनीतिक और सामाजिक कहानियों को सामने लाने का प्रयास करता है। क्योंकि इतिहास केवल उन लोगों का नहीं होता, जिन्होंने सत्ता हासिल की। इतिहास उनका भी होता है, जिन्होंने सही समझे गए सिद्धांत के लिए सत्ता का रास्ता छोड़ दिया।