
हिंदी सिनेमा का इतिहास केवल राज कपूर, गुरु दत्त, बिमल रॉय और महबूब खान जैसे बड़े नामों से नहीं बना। इस इतिहास में कुछ ऐसे फिल्मकार भी थे, जिन्होंने अपनी अलग दुनिया रची। उनकी फिल्मों में शाही महल थे। तलवारें थीं। रहस्य थे। रोमांच था। पहलवान थे। खूबसूरत नायिकाएं थीं। और सबसे बढ़कर था उस दौर के दर्शकों का मनोरंजन करने का जुनून। ऐसे ही फिल्मकार थे केदार कपूर। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि उनका फिल्मी सफर हिंदी सिनेमा के उस दौर की कहानी भी कहता है, जब सीमित साधनों में बड़े सपने पर्दे पर उतारे जाते थे।
एक शहर, जो अब भारत में नहीं है… और वहीं से शुरू हुई कहानी
केदार कपूर का जन्म 2 सितंबर 1927 को पेशावर में हुआ था। उस समय भारत विभाजित नहीं हुआ था। पेशावर तत्कालीन ब्रिटिश भारत के नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस का हिस्सा था। आज वही शहर पाकिस्तान में है। यानी जिस व्यक्ति ने आगे चलकर हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान बनाई, उसकी जिंदगी की शुरुआत उस भूगोल में हुई, जो बाद में इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक घटनाओं में से एक का हिस्सा बना।
पेशावर से मुंबई तक का सफर केवल दूरी का सफर नहीं था। यह बदलते भारत और बदलते सिनेमा के बीच से गुजरने वाली यात्रा थी। कपूर ने उस दौर में फिल्में बनाईं, जब फिल्म निर्माण आज जितना तकनीकी रूप से आसान नहीं था। संसाधन सीमित थे। शूटिंग मुश्किल थी। विशेष प्रभाव बेहद साधारण होते थे। फिर भी फिल्मकारों में कल्पना की कोई कमी नहीं थी। केदार कपूर भी इसी पीढ़ी का हिस्सा थे, जिसने दर्शकों को थिएटर तक खींचने के लिए कहानी और तमाशे का अनोखा मेल तैयार किया।
पहली फिल्म में ही शुरू हुआ वह सफर, जो तीन दशक तक चला
केदार कपूर ने 1954 की फिल्म ‘लाल परी’ से निर्देशन की दुनिया में कदम रखा। यह शुरुआत उस समय हुई, जब हिंदी सिनेमा तेजी से अपना विस्तार कर रहा था। दर्शकों की पसंद भी लगातार बदल रही थी। सामाजिक फिल्मों के साथ-साथ रोमांच, ऐतिहासिक कथाएं, फैंटेसी और स्टंट फिल्मों का भी अपना बड़ा दर्शक वर्ग था।
कपूर ने इसी लोकप्रिय सिनेमा की नब्ज को पहचाना। उनकी फिल्मोग्राफी पर नजर डालें, तो इसमें किसी एक शैली की सीमा दिखाई नहीं देती। ‘खैबर’, ‘लाल परी’, ‘मस्त कलंदर’, ‘मिस कोका कोला’, ‘इंसाफ’, ‘इंकलाब’ और ‘चंगेज खान’ जैसी फिल्मों से लेकर बाद की फिल्मों तक उनका सफर काफी विविध रहा। उन्होंने ऐसी कहानियां चुनीं, जिनमें दर्शकों को मनोरंजन के कई रंग एक साथ मिल सकें।
जब ‘चंगेज खान’ के जरिए इतिहास पर्दे पर आया
1957 में आई ‘चंगेज खान’ उनके करियर की चर्चित फिल्मों में शामिल रही। इतिहास के एक बेहद शक्तिशाली और विवादास्पद चरित्र को पर्दे पर प्रस्तुत करना अपने आप में बड़ी चुनौती थी। आज की तरह विशाल सेट, डिजिटल तकनीक और कंप्यूटर ग्राफिक्स उपलब्ध नहीं थे। इसलिए उस समय के फिल्मकारों को उपलब्ध संसाधनों से ही विशाल दुनिया बनानी पड़ती थी।
केदार कपूर ने ऐतिहासिक और साहसिक सिनेमा की इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। उनके लिए पर्दा केवल बातचीत और पारिवारिक भावनाओं का माध्यम नहीं था। वह रोमांच पैदा करने वाली दुनिया भी था। तलवारें, घोड़े, युद्ध, राजघराने और संघर्ष उनकी फिल्मों के संसार का हिस्सा बनते रहे।
‘मिस कोका कोला’ और बदलता हुआ शहरी सिनेमा
1955 की ‘मिस कोका कोला’ उनके फिल्मी सफर का एक अलग रंग दिखाती है। उस दौर में शहरी जीवन, आधुनिकता और ग्लैमर को लेकर हिंदी सिनेमा में नई दिलचस्पी पैदा हो रही थी। फिल्मों के नाम तक बदलते समय की झलक देने लगे थे।
केदार कपूर ने भी अपनी फिल्मोग्राफी में इस बदलाव को जगह दी। उनके निर्देशन में कभी ऐतिहासिक कथानक दिखाई दिया। कभी सामाजिक कहानी सामने आई। कभी रोमांच ने जगह बनाई। यही विविधता उनके काम को दिलचस्प बनाती है।
उनकी फिल्में हमेशा मुख्यधारा की सबसे चर्चित फिल्मों में नहीं गिनी गईं। फिर भी उनके काम ने हिंदी सिनेमा के उस बड़े हिस्से को प्रतिनिधित्व दिया, जिसे आज अक्सर ‘मसाला’, ‘स्टंट’ या ‘बी-ग्रेड’ सिनेमा कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। मगर उस समय इन फिल्मों के पीछे भी दर्शकों की मजबूत मांग थी।
फिर आया ‘सपन सुहाने’ का दौर
1961 में ‘सपन सुहाने’ और उसी दौर में ‘वारंट’ तथा ‘सेनापति’ जैसी फिल्मों के जरिए कपूर लगातार सक्रिय रहे। यह वह समय था, जब हिंदी सिनेमा में नई पीढ़ी के कलाकार सामने आ रहे थे। गीत-संगीत का महत्व बढ़ रहा था। स्टार सिस्टम मजबूत हो रहा था। दर्शक अपने पसंदीदा कलाकारों को अलग-अलग भूमिकाओं में देखना चाहते थे।
केदार कपूर ने इस बदलाव के बीच अपनी फिल्मों की गति बनाए रखी। उनकी फिल्मोग्राफी बताती है कि वह एक-दो फिल्मों के निर्देशक नहीं थे। वह लगातार काम करने वाले फिल्मकार थे। 1950 के दशक से लेकर 1980 के दशक तक उनका निर्देशन जारी रहा।
‘जब से तुम्हें देखा है’ और सितारों से सजी दुनिया
1963 की ‘जब से तुम्हें देखा है’ उनके करियर की उन फिल्मों में रही, जिसे आज पुराने हिंदी सिनेमा के प्रशंसक विशेष रुचि से देखते हैं। फिल्म में शम्मी कपूर और शशि कपूर जैसे नाम थे। इसके साथ ही भगवान, ओम प्रकाश, कुमकुम और श्यामा जैसे कलाकारों की मौजूदगी ने फिल्म को अपने दौर का खास चेहरा दिया।
इस फिल्म से जुड़ी एक खास बात इसकी चर्चित कव्वाली भी रही। पुराने सिनेमा के प्रशंसकों के लिए ऐसे गीत केवल फिल्म का हिस्सा नहीं थे। वे अपने समय की सामाजिक और सांस्कृतिक दुनिया की झलक भी देते थे।
शम्मी कपूर की ऊर्जा और शशि कपूर की मौजूदगी के बीच केदार कपूर ने ऐसी फिल्म बनाई, जिसमें उस दौर के मनोरंजन का पूरा रंग दिखाई देता है। यही वजह है कि दशकों बाद भी पुराने सिनेमा के खोजी दर्शक इन फिल्मों को ढूंढते हैं।
‘आया तूफान’ में था ऐसा तूफान, जिसे आज देखकर मुस्कान आ सकती है
1964 में आई ‘आया तूफान’ केदार कपूर की सबसे दिलचस्प फिल्मों में गिनी जा सकती है। फिल्म में दारा सिंह और हेलन जैसे कलाकार थे। कहानी में रोमांच था। पहलवान थे। और उस समय की कल्पना के अनुसार विशेष प्रभाव भी थे।
आज के दर्शक अगर इसके स्पेशल इफेक्ट देखें, तो शायद उन्हें तकनीकी सीमाएं साफ दिखाई दें। मगर यही बात इस फिल्म को पुराने सिनेमा का अनोखा दस्तावेज भी बनाती है। उस समय कंप्यूटर से दृश्य बनाना संभव नहीं था। इसलिए कैमरा ट्रिक, सेट, मिनिएचर और उपलब्ध तकनीकों से तूफान और रोमांच पैदा किया जाता था।
यह फिल्म शायद आधुनिक अर्थों में महान फिल्म न हो। लेकिन पुराने भारतीय स्टंट सिनेमा की भावना को समझने के लिए यह बेहद रोचक उदाहरण है। केदार कपूर ने उस दौर के दर्शकों की कल्पना को पर्दे पर उतारने की कोशिश की थी।
दारा सिंह से लेकर शम्मी कपूर तक, सितारों की लंबी कतार
1960 का दशक केदार कपूर के लिए बेहद व्यस्त रहा। ‘सिकंदर-ए-आज़म’, ‘तरज़न कम्स टू दिल्ली’, ‘राका’, ‘रुस्तम-ए-हिंद’, ‘बॉम्बे रेस कोर्स’, ‘दादा’, ‘सुनेहरा जाल’ और ‘हुस्न का गुलाम’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग विषयों को छुआ।
यह सूची केवल फिल्मों की संख्या नहीं बताती। यह उस समय के हिंदी सिनेमा की विविधता भी दिखाती है। एक तरफ ऐतिहासिक कहानियां थीं। दूसरी ओर स्टंट और रोमांच था। कहीं सामाजिक कहानी थी। कहीं लोकप्रिय मनोरंजन का सीधा फार्मूला था।
केदार कपूर ने इस पूरी दुनिया में लगातार काम किया। यही निरंतरता उनके करियर की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी।
1970 का दशक भी नहीं रुका
1971 में ‘पतंगा’ आई। इसके बाद ‘चट्टान सिंह’, ‘तूफान’, ‘अलीबाबा मरजीना’ और ‘दो हवलदार’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया गया। खासकर ‘दो हवलदार’ जैसे शीर्षक बताते हैं कि लोकप्रिय मनोरंजन उनके सिनेमा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
उस समय सिनेमा हॉल केवल फिल्म देखने की जगह नहीं थे। वे आम आदमी के मनोरंजन का बड़ा केंद्र थे। दर्शक टिकट खरीदकर ऐसी दुनिया में जाना चाहते थे, जहां उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से बिल्कुल अलग रोमांच मौजूद हो। केदार कपूर की फिल्मों ने इसी इच्छा को पूरा करने की कोशिश की।
परिवार में भी सिनेमा की विरासत आगे बढ़ी
केदार कपूर की बेटी मधु कपूर भी फिल्मों से जुड़ीं। उन्होंने 1979 में राजश्री प्रोडक्शंस की फिल्म ‘सांच को आंच नहीं’ से अभिनय की शुरुआत की। इस तरह सिनेमा केवल केदार कपूर के पेशे तक सीमित नहीं रहा। उनकी अगली पीढ़ी ने भी फिल्मी दुनिया में कदम रखा।
यह तथ्य उनकी निजी जिंदगी को उनके पेशे से जोड़ता है। एक फिल्म निर्देशक के लिए इससे बड़ी विरासत क्या हो सकती है कि उसकी संतान भी उसी रचनात्मक दुनिया का हिस्सा बने।
आखिरी दौर तक कैमरे से रिश्ता नहीं टूटा
1980 में ‘मनोकामना’ और 1983 में ‘बेखबर’ जैसी फिल्मों के साथ केदार कपूर ने अपने लंबे निर्देशन करियर के अंतिम दौर में भी काम किया। यह लगभग तीन दशकों तक फैले उनके फिल्मी सफर का प्रमाण है।
1954 से 1980 के दशक तक हिंदी सिनेमा पूरी तरह बदल चुका था। तकनीक बदल गई थी। कलाकारों की नई पीढ़ियां आ चुकी थीं। फिल्मों का संगीत बदल रहा था। दर्शकों की पसंद भी बदल रही थी। फिर भी केदार कपूर ने बदलते समय के साथ काम करना जारी रखा।
5 जून 1987 को थम गया एक लंबा फिल्मी सफर
5 जून 1987 को मुंबई में केदार कपूर का निधन हुआ। उनकी उम्र लगभग 59 वर्ष थी। उनके जाने के साथ हिंदी सिनेमा के उस दौर का एक फिल्मकार भी चला गया, जिसने मुख्यधारा के लोकप्रिय मनोरंजन की अलग दुनिया को लंबे समय तक संभाले रखा।
आज जब पुरानी फिल्मों का जिक्र होता है, तो अक्सर कुछ चुनिंदा महान निर्देशकों के नाम सामने आते हैं। मगर सिनेमा का इतिहास केवल उन्हीं नामों से पूरा नहीं होता। पर्दे के पीछे हजारों कलाकारों और तकनीशियनों ने मिलकर भारतीय सिनेमा की विशाल इमारत बनाई।
केदार कपूर भी उसी इमारत के एक महत्वपूर्ण हिस्से थे।
आखिर क्यों याद किया जाना चाहिए केदार कपूर को?
केदार कपूर की फिल्मों को केवल आज की तकनीकी कसौटी पर देखना शायद उनके समय के साथ न्याय नहीं होगा। उस दौर में सीमित साधनों के बावजूद दर्शकों को रोमांचित करने की कोशिश की जाती थी। कहानियां बड़ी होती थीं। सपने बड़े होते थे। पर्दे पर तूफान भी आता था। जंगल भी दिखाई देता था। राजाओं की दुनिया भी बनती थी। पहलवान भी लड़ते थे। और गीतों के बीच प्रेम भी खिलता था।
उनका सिनेमा उस दौर की लोकप्रिय कल्पना का आईना था। शायद इसी कारण उनकी फिल्में आज भी पुराने सिनेमा के शोधकर्ताओं और प्रशंसकों के लिए दिलचस्प बनी हुई हैं।
केदार कपूर की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक निर्देशक को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह हिंदी सिनेमा के उस भूले हुए अध्याय को सलाम करना है, जिसने दर्शकों को सपने देखने की वजह दी।
Old is Gold Films ऐसे ही भूले-बिसरे फिल्मकारों, कलाकारों और किस्सों को फिर से आपके सामने लाने की कोशिश करता है। क्योंकि सिनेमा की असली विरासत केवल सुपरस्टारों की कहानियों में नहीं छिपी। कई बार वह उन नामों में मिलती है, जिन्हें समय ने धीरे-धीरे भुला दिया।
