
क्या आपने कभी सोचा है… एक गाना पूरी ज़िंदगी बदल सकता है, लेकिन उसी सफलता की कीमत किसी का पूरा करियर भी छीन सकती है?
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे कलाकार हुए हैं, जिनकी कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती। संघर्ष, सपने, विश्वासघात, सफलता, गिरावट और फिर एक बिल्कुल नए रूप में वापसी—यह सब अगर किसी एक इंसान की ज़िंदगी में हुआ, तो वह थीं उमा देवी खत्री, जिन्हें पूरी दुनिया टुन टुन के नाम से जानती है। आज लोग उन्हें बॉलीवुड की पहली महिला कॉमेडियन के रूप में याद करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कॉमेडियन बनने से पहले वह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की सबसे चर्चित प्लेबैक सिंगर्स में से एक थीं। उनकी आवाज़ रेडियो पर गूंजती थी, उनके गीत सुपरहिट होते थे और संगीतकार उनकी तारीफ करते नहीं थकते थे। लेकिन एक ऐसा फैसला आया जिसने उनकी गायकी लगभग खत्म कर दी। इसके बाद जो हुआ, उसने भारतीय सिनेमा का इतिहास बदल दिया।
OLDISGOLDFILMS की इस विशेष प्रस्तुति में जानिए उस महिला की पूरी कहानी, जिसने हर मुश्किल को मुस्कुराकर स्वीकार किया और साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी एक पहचान की मोहताज नहीं होती।
बचपन में सिर से उठ गया माता-पिता का साया… लेकिन एक सपना कभी नहीं टूटा
11 जुलाई 1923 को उत्तर प्रदेश में जन्मी उमा देवी का बचपन बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता। छोटी उम्र में ही माता-पिता का निधन हो गया और उनका पालन-पोषण उनके चाचा के घर हुआ। उस समय समाज में लड़कियों की शिक्षा को महत्व नहीं दिया जाता था। उनके चाचा भी यही मानते थे कि लड़कियों को पढ़ाने की कोई ज़रूरत नहीं है।
लेकिन उमा देवी अलग थीं। उन्होंने किसी स्कूल में पढ़ाई नहीं की, फिर भी खुद ही हिंदी पढ़ना-लिखना सीख लिया। जब भी रेडियो पर गाने बजते, वह उन्हें बड़े ध्यान से सुनतीं और फिर उसी अंदाज़ में गुनगुनाने की कोशिश करतीं। उनके मन में केवल एक सपना था—एक दिन रेडियो पर उनकी अपनी आवाज़ बजेगी।
यह सपना इतना बड़ा था कि उसने उन्हें घर छोड़ने का साहस दे दिया।
23 साल की लड़की ने अकेले छोड़ा घर… और सीधे पहुंच गई बंबई, जहां हर कदम पर संघर्ष इंतज़ार कर रहा था
आज के समय में किसी नए शहर जाना आसान लग सकता है, लेकिन 1940 के दशक में अकेली लड़की का घर छोड़कर बंबई जाना किसी क्रांति से कम नहीं था।
उमा देवी अपने सपनों का पीछा करते हुए बंबई पहुंचीं। न पैसा था, न कोई बड़ा सहारा और न ही फिल्म इंडस्ट्री में कोई पहचान। लेकिन उनके पास एक चीज़ थी—अपनी आवाज़ पर अटूट विश्वास।
उन्होंने कई लोगों से मिलकर मशहूर संगीतकार नौशाद अली तक पहुंचने की कोशिश की। आखिरकार जब मौका मिला, तो उन्होंने नौशाद से कहा—
“अगर आपने मुझे गाने का एक मौका नहीं दिया, तो मैं समुद्र में कूद जाऊंगी।”
यह सिर्फ भावुक संवाद नहीं था। यह उस लड़की की आखिरी उम्मीद थी, जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं था।
नौशाद ने जब पहली बार उनकी आवाज़ सुनी… तो उसी पल बदल गई किस्मत
नौशाद ने उनकी जिद देखकर ऑडिशन लिया।
जैसे ही उमा देवी ने गाना शुरू किया, कमरे का माहौल बदल गया। बिना किसी औपचारिक शास्त्रीय शिक्षा के उनकी आवाज़ में ऐसी मिठास, दर्द और सच्चाई थी कि नौशाद तुरंत समझ गए कि उनके सामने असाधारण प्रतिभा खड़ी है।
उन्हें तुरंत फिल्म ‘वामिक अज़रा’ (1946) में पहला प्लेबैक गाने का मौका मिल गया।
यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा सफर, जिसने उन्हें कुछ ही समय में उस दौर की बड़ी गायिकाओं—नूरजहाँ, राजकुमारी, खुर्शीद, जोहराबाई अंबालावाली और सुरैया—की कतार में खड़ा कर दिया।
एक गीत ने उन्हें रातोंरात सुपरस्टार बनाया… और उसी गीत ने दिल भी जीत लिया
1947 में आई फिल्म ‘दर्द’ उमा देवी के करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई।
“अफसाना लिख रही हूँ दिल-ए-बेकरार का” पूरे देश में गूंज उठा। रेडियो पर यह गीत बार-बार बजता था। लोग इस आवाज़ के दीवाने हो गए।
कहा जाता है कि दिल्ली के एक युवक ने सिर्फ यह गीत सुनकर उमा देवी से मिलने का फैसला किया। वह बंबई पहुंचे, दोनों की मुलाकात हुई और बाद में दोनों ने विवाह कर लिया। यही युवक बाद में उनके जीवनसाथी बने, जिन्हें वह प्यार से मोहन कहती थीं।
कभी-कभी एक गीत सिर्फ लोकप्रिय नहीं होता, वह किसी की पूरी जिंदगी बदल देता है।
जब हर फिल्म का गाना हिट होने लगा… तब लगा कि अब कोई उन्हें रोक नहीं सकता
‘दर्द’ के बाद फिल्म ‘अनोखी अदा’, ‘दिल्लगी’, ‘रात’, ‘नाटक’ और कई फिल्मों में उनकी आवाज़ ने जादू बिखेरा।
“काहे जिया डोले”, “दिल को लगाके कुछ भी न पाया” जैसे गीत लोगों के दिलों में बस गए।
उनकी आवाज़ की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उसमें बनावट नहीं थी। दर्द हो या खुशी, उनकी गायकी सीधे दिल तक पहुंचती थी।
ऐसा लगने लगा था कि हिंदी फिल्म संगीत को एक नई महान गायिका मिल चुकी है।
लेकिन किस्मत अभी एक ऐसा मोड़ लेकर आने वाली थी, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।
सिर्फ एक फिल्म… और खत्म हो गया चमकता हुआ सिंगिंग करियर! आखिर क्यों?
1948 में निर्देशक एस. एस. वासन की भव्य फिल्म ‘चंद्रलेखा’ बनी।
उमा देवी ने इस फिल्म में सात गीत गाए और सभी बेहद लोकप्रिय हुए। खास बात यह थी कि उन्होंने बिना किसी शास्त्रीय प्रशिक्षण के इन कठिन गीतों को शानदार तरीके से निभाया।
लेकिन एक समस्या थी।
वह पहले से निर्माता-निर्देशक ए. आर. करदार के साथ अनुबंध में थीं। ‘चंद्रलेखा’ में काम करना उस अनुबंध का उल्लंघन माना गया।
करदार नाराज़ हो गए।
नतीजा इतना बड़ा था कि उनका अनुबंध समाप्त कर दिया गया और इसके साथ ही उनके गायन करियर को लगभग बड़ा झटका लग गया।
एक फैसला… और सब कुछ बदल गया।
उधर एक नई आवाज़ पूरे देश पर छा रही थी… और उमा देवी धीरे-धीरे पीछे छूटने लगीं
इसी दौरान हिंदी फिल्म संगीत में दो नई आवाज़ें तेजी से उभर रही थीं—लता मंगेशकर और आशा भोसले।
उनकी अलग शैली, विस्तृत सुर सीमा और बदलते संगीत के दौर ने पूरी इंडस्ट्री का स्वरूप बदल दिया।
उमा देवी की आवाज़ पुराने दौर की मानी जाने लगी। काम कम होने लगा। जिन स्टूडियो में कभी उनका इंतजार होता था, वहां अब नई गायिकाओं की चर्चा होती थी।
जिस लड़की ने रेडियो पर अपनी आवाज़ सुनने का सपना पूरा किया था, अब वही सोच रही थी कि आगे क्या करे।
जब नौशाद ने कहा—”गाना छोड़ो… लोगों को हंसाओ”
हार मानना उनके स्वभाव में नहीं था।
एक बार फिर वह नौशाद के पास पहुंचीं।
नौशाद ने कहा कि उनके अंदर स्वाभाविक हास्य है, शानदार कॉमिक टाइमिंग है और उन्हें अभिनय करना चाहिए।
पहले तो उमा देवी हिचकिचाईं।
लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी—
अगर अभिनय करेंगी, तो दिलीप कुमार के साथ।
यह सुनकर नौशाद मुस्कुरा दिए और सीधे दिलीप कुमार से बात की।
दिलीप कुमार ने दिया नया नाम… और जन्म हुआ ‘टुन टुन’ का
फिल्म ‘बाबुल’ (1950) में उन्हें अभिनय का अवसर मिला।
यहीं दिलीप कुमार ने उनके लिए एक नया नाम सुझाया—
“टुन टुन”
यह नाम इतना लोकप्रिय हुआ कि धीरे-धीरे लोग उनका असली नाम ही भूल गए।
उमा देवी अब सिर्फ गायिका नहीं रहीं।
भारतीय सिनेमा की पहली महिला कॉमेडियन का जन्म हो चुका था।
जिस बात पर लोग मज़ाक उड़ाते थे… उसी को उन्होंने अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया
उस दौर में फिल्मों में मोटापे का अक्सर मज़ाक बनाया जाता था।
टुन टुन को भी अधिकांश भूमिकाएं इसलिए दी जाती थीं क्योंकि उनका शरीर भारी था।
आज के नजरिए से देखें तो यह उचित नहीं लगता। लेकिन उस समय यही फिल्मों की वास्तविकता थी।
फर्क सिर्फ इतना था कि टुन टुन ने इसे कमजोरी नहीं बनने दिया।
वह कहा करती थीं—
“मेरा मोटापा ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है। अगर मैं पतली होती, तो शायद टुन टुन कभी पैदा ही नहीं होती।”
यह सोच उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाती थी।
गुरु दत्त से अमिताभ बच्चन तक… हर दौर में छा गईं टुन टुन
एक बार कॉमेडी में सफलता मिलने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
‘आर पार’, ‘मिस्टर एंड मिसेज़ 55’, ‘प्यासा’, ‘मोम की गुड़िया’, ‘नमक हलाल’ जैसी फिल्मों में उन्होंने दर्शकों को खुलकर हंसाया।
उन्होंने भगवान दादा, जॉनी वॉकर, मुकरी, धूमल, सुंदर, आगा, केष्टो मुखर्जी जैसे लगभग हर बड़े कॉमेडियन के साथ काम किया।
करीब पांच दशकों तक फैले अपने करियर में उन्होंने लगभग 200 फिल्मों में अभिनय किया और भारतीय सिनेमा में महिला कॉमेडियन की एक नई परंपरा शुरू की।
लोग हंसते रहे… लेकिन उस मुस्कान के पीछे छिपा था दर्द
टुन टुन की स्क्रीन पर मौजूदगी लोगों को खुशी देती थी।
लेकिन लगातार बढ़ते वजन के कारण उन्हें कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा।
उन्होंने कई बार स्वीकार किया कि मोटापे ने उन्हें शारीरिक तकलीफें दीं, लेकिन उन्होंने कभी इसे अपने आत्मविश्वास पर हावी नहीं होने दिया।
उनका मानना था कि कलाकार की पहचान उसके शरीर से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा से होती है।
शायद यही कारण है कि आज भी लोग उनके चेहरे की मुस्कान और बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग को याद करते हैं, न कि सिर्फ उनके शरीर को।
आज भी क्यों अमर है टुन टुन की विरासत?
24 नवंबर 2003 को टुन टुन ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी कहानी आज भी नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा है।
उन्होंने साबित किया कि सपनों का कोई तय रास्ता नहीं होता। अगर एक दरवाज़ा बंद हो जाए, तो दूसरा दरवाज़ा इतिहास भी बना सकता है।
वह पहले एक सफल गायिका बनीं।
फिर परिस्थितियों ने उनसे वह पहचान छीन ली।
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
उन्होंने खुद को दोबारा गढ़ा और बॉलीवुड की पहली महिला कॉमेडियन बनकर हमेशा के लिए इतिहास में अपना नाम दर्ज करा दिया।
आज जब भी हिंदी सिनेमा की महान महिला कलाकारों की चर्चा होती है, टुन टुन का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि प्रतिभा कभी खत्म नहीं होती, उसे केवल नया मंच चाहिए। और शायद यही वजह है कि टुन टुन सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और अदम्य साहस की जीवित मिसाल बन गईं।
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