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हीरो से भी महंगा था यह विलेन, लोग असल जिंदगी में भी खाते थे खौफ! आखिर कैसे बना बॉलीवुड का अमर ‘शेर खान’? | OLDISGOLDFILMS

How Bollywood's Legendary Sher Khan Became an Icon | OLDISGOLDFILMS
How Bollywood’s Legendary Sher Khan Became an Icon | OLDISGOLDFILMS

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे अभिनेता हुए जिन्होंने अपनी मुस्कान से दर्शकों का दिल जीता। कई ऐसे भी आए जिन्होंने रोमांस, कॉमेडी और एक्शन से अपनी अलग पहचान बनाई। लेकिन क्या आपने कभी ऐसे कलाकार के बारे में सुना है, जिसे देखकर दर्शक सिनेमा हॉल में सिहर उठते थे? जिसकी स्क्रीन पर एंट्री होते ही बच्चों से लेकर बड़े तक डर जाते थे। जिसकी खलनायकी इतनी असरदार थी कि लोग उसे असल जिंदगी में भी खतरनाक इंसान समझने लगे। इतना ही नहीं, एक समय ऐसा भी आया जब वह फिल्मों के हीरो से भी ज्यादा फीस लेने लगा। आखिर कौन था यह अभिनेता? कैसे एक साधारण युवक भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा विलेन बना? और क्यों उसे हमेशा के लिए ‘शेर खान’ के नाम से याद किया जाने लगा? आइए जानते हैं इस असाधारण सफर की पूरी कहानी।

जब एक पान की दुकान ने बदल दी किस्मत

फिल्मी दुनिया में अक्सर कहा जाता है कि किस्मत कब, कहां और किस रूप में दरवाजा खटखटा दे, कोई नहीं जानता। प्राण कृष्ण सिकंद की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उनका सपना अभिनेता बनने का नहीं था। उन्हें फोटोग्राफी का शौक था और वे कैमरे के पीछे अपना भविष्य देखते थे। लेकिन लाहौर की एक साधारण पान की दुकान पर हुई एक मुलाकात ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी।

कहानी शुरू होती है लेखक वली मोहम्मद वली से, जिन्होंने पहली बार प्राण की प्रभावशाली शख्सियत देखी। उनका व्यक्तित्व, आत्मविश्वास और चेहरा ऐसा था कि वली मोहम्मद ने बिना देर किए उन्हें फिल्मों में आने का सुझाव दिया। शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही युवक आने वाले दशकों में भारतीय सिनेमा का सबसे चर्चित खलनायक बनेगा।

लाहौर से मुंबई तक… संघर्ष, बंटवारा और नई शुरुआत

प्राण ने अपने शुरुआती फिल्मी सफर की शुरुआत लाहौर फिल्म इंडस्ट्री से की। उनकी शुरुआती फिल्मों में उन्हें नायक के रूप में भी देखा गया। धीरे-धीरे उनका नाम वहां पहचान बनाने लगा था। लेकिन फिर आया देश का विभाजन। 1947 का बंटवारा केवल लाखों लोगों के लिए नहीं, बल्कि प्राण के जीवन के लिए भी सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।

सब कुछ पीछे छोड़कर उन्हें मुंबई आना पड़ा। नए शहर में फिर से पहचान बनाना आसान नहीं था। लेकिन प्रतिभा कभी ज्यादा समय तक छिपी नहीं रहती। जल्द ही फिल्म ‘जिद्दी’ ने उन्हें बॉलीवुड में नई पहचान दिलाई और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा।

ऐसा विलेन जिससे पर्दे के बाहर भी डरते थे लोग

आज फिल्मों में विलेन और हीरो दोनों को बराबर प्यार मिलता है। लेकिन उस दौर में खलनायक का असर कुछ और ही था। प्राण जब स्क्रीन पर आते थे तो दर्शकों के मन में गुस्सा, डर और नफरत एक साथ पैदा हो जाती थी।

उनकी आंखों का भाव, संवाद बोलने का अंदाज, चेहरे की गंभीरता और आवाज की गूंज इतनी वास्तविक लगती थी कि लोग उन्हें असल जिंदगी में भी वैसा ही समझने लगे। कई किस्सों में यह बताया जाता है कि महिलाएं उन्हें देखकर रास्ता बदल लेती थीं। बच्चे उनके पास जाने से घबराते थे। यहां तक कि कई परिवारों ने अपने बच्चों का नाम ‘प्राण’ रखना भी बंद कर दिया था क्योंकि उनके मन में यह नाम खलनायकी का पर्याय बन चुका था।

यही किसी अभिनेता की सबसे बड़ी सफलता होती है कि दर्शक उसके निभाए किरदार को ही उसकी असली पहचान मान बैठें।

जब विलेन की फीस हीरो से भी ज्यादा हो गई

आज के दौर में किसी सुपरस्टार का सबसे ज्यादा फीस लेना सामान्य बात लगती है। लेकिन कल्पना कीजिए उस समय की, जब फिल्मों का पूरा कारोबार हीरो के नाम पर चलता था। ऐसे दौर में एक खलनायक फिल्म के मुख्य अभिनेता से ज्यादा मेहनताना ले रहा था।

प्राण की लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी थी कि निर्माता केवल उनके नाम पर फिल्म बेचने लगे थे। कई फिल्मों के पोस्टरों पर ‘And Pran’ या ‘Above All Pran’ लिखकर उनका नाम विशेष रूप से प्रकाशित किया जाता था। यह सम्मान उस दौर में बहुत कम कलाकारों को मिला।

फिल्म इंडस्ट्री में यह भी चर्चा रही कि कई फिल्मों में उन्हें मुख्य अभिनेता से अधिक पारिश्रमिक दिया गया। यह केवल उनकी लोकप्रियता नहीं, बल्कि उनके अभिनय की कीमत थी। निर्माता जानते थे कि अगर फिल्म में प्राण हैं, तो दर्शक उन्हें देखने जरूर आएंगे।

400 से ज्यादा फिल्मों का ऐसा रिकॉर्ड जिसे दोहराना आसान नहीं

प्राण केवल लोकप्रिय नहीं थे, बल्कि अविश्वसनीय रूप से मेहनती कलाकार भी थे। लगभग छह दशकों तक फैले अपने फिल्मी सफर में उन्होंने 400 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। हर फिल्म में उनका किरदार अलग होता था।

कभी निर्दयी जमींदार, कभी तस्कर, कभी चालाक व्यापारी, कभी गैंगस्टर और कभी ऐसा खलनायक जो दर्शकों के दिल में हमेशा के लिए बस जाए। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। वे कभी खुद को दोहराते नहीं थे।

उनकी प्रमुख फिल्मों में ‘मधुमती’, ‘देवदास’, ‘राम और श्याम’, ‘मुनीमजी’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘हलाकू’, ‘आज़ाद’, ‘अमरदीप’ जैसी कई यादगार फिल्में शामिल हैं। हर फिल्म में उन्होंने यह साबित किया कि खलनायक केवल कहानी का विरोधी नहीं होता, बल्कि पूरी कहानी की जान भी हो सकता है।

एक दोस्त ने दिलाया ऐसा मौका जिसने बदल दी जिंदगी

लाहौर के दिनों में प्राण की दोस्ती फिल्म पत्रकार वी. एन. नैयर से हुई। यह दोस्ती आगे चलकर उनके करियर की बड़ी सीढ़ी बनी।

वी. एन. नैयर ने अपने डॉक्टर मित्र आनंद प्रकाश पारकर को फिल्म निर्माण के लिए प्रेरित किया। जब हीरो चुनने की बारी आई तो उन्होंने बिना किसी झिझक के प्राण का नाम सुझाया। इसी तरह फिल्म ‘परदेसी बालम’ में प्राण को बतौर हीरो काम मिला।

कहा जाता है कि इसी फिल्म की कमाई से प्राण ने अपने जीवन की पहली कार खरीदी थी। भले ही आज उस फिल्म के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध हो, लेकिन यह फिल्म उनके जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है।

फिर आया वह किरदार जिसने हमेशा के लिए बदल दी पहचान

1973 में रिलीज हुई फिल्म ‘जंजीर’ भारतीय सिनेमा का इतिहास बदलने वाली फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म ने अमिताभ बच्चन को ‘एंग्री यंग मैन’ बनाया, लेकिन इसी फिल्म ने प्राण को हमेशा के लिए ‘शेर खान’ बना दिया।

शेर खान केवल एक किरदार नहीं था, बल्कि दोस्ती, ईमानदारी और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया। पठानी अंदाज, शानदार संवाद, दमदार व्यक्तित्व और दिल जीत लेने वाली अदाकारी ने इस किरदार को अमर बना दिया।

दिलचस्प बात यह थी कि प्राण इससे पहले वर्षों तक सबसे खतरनाक विलेन के रूप में पहचाने जाते थे। लेकिन ‘शेर खान’ ने दर्शकों को उनका एक नया चेहरा दिखाया। लोगों ने पहली बार महसूस किया कि यह अभिनेता केवल डराना ही नहीं, बल्कि दिल जीतना भी जानता है।

मलंग काका ने बदल दी लोगों की सोच

जब हर कोई उन्हें केवल खलनायक मानने लगा था, तब मनोज कुमार ने फिल्म ‘उपकार’ में उन्हें ‘मलंग काका’ का किरदार दिया।

यह निर्णय जोखिम भरा था। लेकिन परिणाम ऐतिहासिक साबित हुआ। वर्षों तक जिन दर्शकों ने उनसे नफरत की थी, वही दर्शक अब उन्हें सम्मान और प्यार देने लगे। उनकी छवि पूरी तरह बदल गई। इसके बाद ‘विक्टोरिया नंबर 203’, ‘डॉन’, ‘अमर अकबर एंथनी’ और कई फिल्मों में उन्होंने यह साबित कर दिया कि महान अभिनेता वही होता है जो हर तरह के किरदार में समान प्रभाव छोड़ सके।

सम्मान, पुरस्कार और अमर विरासत

भारतीय सिनेमा में प्राण का योगदान केवल फिल्मों की संख्या तक सीमित नहीं था। उन्होंने अभिनय की उस कला को नई ऊंचाई दी, जहां खलनायक भी फिल्म का सबसे लोकप्रिय पात्र बन सकता है।

उन्हें पद्म भूषण सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। वर्ष 2013 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहेब फाल्के पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल एक अभिनेता को नहीं, बल्कि उस कलाकार को मिला जिसने भारतीय फिल्मों में खलनायकी की परिभाषा ही बदल दी।

12 जुलाई 2013 को 93 वर्ष की आयु में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन उनकी फिल्मों के संवाद, उनके किरदार और उनका अभिनय आज भी उतना ही जीवंत महसूस होता है जितना दशकों पहले था।

क्या आज भी कोई दूसरा प्राण बन सकता है?

आज तकनीक बदल चुकी है। फिल्मों का अंदाज बदल गया है। विलेन की परिभाषा भी बदल चुकी है। लेकिन जब भी भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली खलनायकों का नाम लिया जाएगा, प्राण कृष्ण सिकंद का नाम सबसे ऊपर रहेगा।

वह केवल एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि अभिनय की ऐसी पाठशाला थे, जिन्होंने यह साबित किया कि महान कलाकार बनने के लिए हीरो होना जरूरी नहीं होता। अगर अभिनय सच्चा हो तो खलनायक भी इतिहास रच सकता है। शायद यही वजह है कि आज भी जब ‘शेर खान’ का नाम लिया जाता है तो सबसे पहले प्राण का चेहरा आंखों के सामने उभर आता है।

ऐसी ही अनसुनी, दुर्लभ और दिलचस्प कहानियों के लिए जुड़े रहिए OLDISGOLDFILMS के साथ, जहां भारतीय सिनेमा के सुनहरे इतिहास के अनकहे किस्से आपको हर बार एक नई दुनिया में ले जाते हैं।

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