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सुपरहिट फिल्म मिली, लेकिन हीरो का करियर खत्म हो गया! विक्रम मकानदार और ‘जूली’ की अनसुनी कहानी

सुपरहिट फिल्म मिली, लेकिन हीरो का करियर खत्म हो गया! विक्रम मकानदार और ‘जूली’ की अनसुनी कहानी
सुपरहिट फिल्म मिली, लेकिन हीरो का करियर खत्म हो गया! विक्रम मकानदार और ‘जूली’ की अनसुनी कहानी

फिल्मी दुनिया में हर कलाकार का सपना होता है कि उसे एक बड़ी हिट फिल्म मिले।

आमतौर पर माना जाता है कि सुपरहिट फिल्म किसी भी अभिनेता की किस्मत बदल देती है।

लेकिन हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा अभिनेता भी हुआ, जिसके लिए सुपरहिट फिल्म ही सबसे बड़ा नुकसान साबित हुई।

यह कहानी है अभिनेता विक्रम मकानदार की।

एक ऐसे कलाकार की, जो 1970 के दशक में तेजी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा था।

निर्माता और निर्देशक उसे लगातार फिल्मों में साइन कर रहे थे।

करियर की रफ्तार इतनी तेज थी कि वह एक साथ दर्जनों फिल्मों में काम कर रहा था।

लेकिन फिर एक फिल्म आई, जिसने सब कुछ बदल दिया।

उस फिल्म का नाम था “जूली”

यह वही फिल्म थी, जिसके गाने आज भी लोगों की जुबान पर हैं।

मगर इस फिल्म ने विक्रम को वह नहीं दिया, जिसकी उन्हें उम्मीद थी।

OLDISGOLDFILMS में आज कहानी उस अभिनेता की, जिसने सुपरहिट फिल्म तो दी, लेकिन उसी फिल्म को अपने करियर की सबसे बड़ी गलती मानता रहा।


जब किस्मत ने होटल ताज में दस्तक दी

साल 1974 में विक्रम मकानदार का सितारा चमक रहा था।

उनकी फिल्म “कॉलगर्ल” चर्चा में थी।

इंडस्ट्री के लोग उन्हें नए रोमांटिक और एक्शन हीरो के रूप में देखने लगे थे।

इसी दौरान उन्हें एक खास मुलाकात के लिए बुलावा मिला।

जगह थी मुंबई का मशहूर होटल ताज।

वहां उनका सामना दक्षिण भारत के दिग्गज निर्माता बी. नागी रेड्डी और निर्देशक के. सेतूमाधवन से हुआ।

बैठक शुरू होते ही नागी रेड्डी ने विक्रम को सामने रखी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।

विक्रम जैसे ही बैठे, निर्माता ने सीधे कहा,

“पचास हजार रुपए मिलेंगे।”

उस दौर में यह रकम किसी नए अभिनेता के लिए सपने जैसी थी।

विक्रम कुछ बोल ही नहीं पाए।

उनकी खामोशी को निर्माता ने असहमति समझ लिया।

उन्होंने रकम बढ़ाकर पचहत्तर हजार कर दी।

फिर भी विक्रम चुप रहे।

आखिरकार निर्माता बोले,

“एक लाख रुपए से एक रुपया ज्यादा नहीं मिलेगा।”

यह सुनकर विक्रम की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

उन्होंने बिना देर किए फिल्म साइन कर ली।

उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि यही फैसला आगे चलकर उनके जीवन की सबसे चर्चित घटना बनने वाला है।


मलयालम फिल्म का हिंदी रूपांतरण थी ‘जूली’

बहुत कम लोग जानते हैं कि “जूली” कोई मौलिक हिंदी फिल्म नहीं थी।

यह मलयालम फिल्म “चट्टक्कारी” का हिंदी रीमेक थी।

मूल फिल्म भी बेहद सफल रही थी।

इसलिए निर्माताओं को विश्वास था कि हिंदी संस्करण भी दर्शकों को पसंद आएगा।

निर्देशक के. सेतूमाधवन ने दोनों फिल्मों का निर्देशन किया था।

फिल्म की कहानी एक एंग्लो-इंडियन परिवार की लड़की जूली के इर्द-गिर्द घूमती थी।

वह अपने परिवार, समाज और प्रेम के बीच संघर्ष करती दिखाई देती है।

कहानी में भावनाएं थीं।

विवाद था।

और ऐसा विषय था, जिसे उस दौर में बेहद साहसी माना जाता था।

यही वजह थी कि फिल्म रिलीज से पहले ही चर्चा में आ गई थी।


चेन्नई में पहला दिन और एक अजीब अनुभव

फिल्म की शूटिंग के लिए विक्रम को चेन्नई जाना पड़ा।

विजयवाहिनी स्टूडियो में उनका पहला दिन किसी परीक्षा से कम नहीं था।

सेट पर पहुंचते ही निर्देशक ने उन्हें सीधे कैमरे के सामने खड़ा कर दिया।

न कोई रिहर्सल हुई।

न ही सीन की जानकारी दी गई।

विक्रम हैरान थे।

उन्होंने पूछा कि क्या शूट होना है।

जवाब मिला कि एक गाना फिल्माया जाएगा।

उन्होंने गाना सुनने की इच्छा जताई।

लेकिन निर्देशक ने साफ मना कर दिया।

उन्होंने कहा कि कैमरा चालू होगा और सीधे शूट करेंगे।

कुछ ही देर बाद संगीत बजा।

यह फिल्म का मशहूर गीत था,

“भूल गया सबकुछ, याद नहीं अब कुछ…”

विक्रम ने पहला टेक दिया।

और वह शानदार निकला।

पूरा यूनिट तालियां बजाने लगा।

उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यही फिल्म बाद में उनके करियर की दिशा बदल देगी।


जब 11 साल की श्रीदेवी ने किया हिंदी डेब्यू

“जूली” कई कारणों से ऐतिहासिक फिल्म मानी जाती है।

इस फिल्म में दक्षिण भारत की प्रसिद्ध अभिनेत्री लक्ष्मी ने मुख्य भूमिका निभाई थी।

वहीं एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका में एक बाल कलाकार भी दिखाई दीं।

उनका नाम था श्रीदेवी

उस समय श्रीदेवी की उम्र केवल 11 वर्ष थी।

यह उनकी पहली हिंदी फिल्म थी।

आगे चलकर वही बच्ची हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी अभिनेत्रियों में शामिल हुई।

फिल्म में राजेश रोशन ने संगीत दिया था।

यह उनके करियर की पहली फिल्म थी।

उनके संगीत को जबरदस्त सराहना मिली और उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।


कहानी ने मचा दिया तहलका

फिल्म की कहानी उस दौर के हिसाब से बेहद साहसी थी।

एक अविवाहित लड़की का गर्भवती होना और उसके बाद की सामाजिक परिस्थितियों को दिखाना आसान बात नहीं थी।

दर्शकों ने इस विषय को गंभीरता से लिया।

फिल्म के भावनात्मक दृश्यों ने लोगों को प्रभावित किया।

रिलीज के बाद “जूली” बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई।

इसके गीत हर जगह सुनाई देने लगे।

अखबारों और पत्रिकाओं में फिल्म की चर्चा होने लगी।

लेकिन इस सफलता के बीच एक व्यक्ति ऐसा भी था, जो अंदर ही अंदर निराश था।

वह थे विक्रम मकानदार।


सुपरहिट फिल्म के बाद क्यों खत्म होने लगा करियर?

आमतौर पर किसी सफल फिल्म के बाद अभिनेता के पास फिल्मों की लाइन लग जाती है।

लेकिन विक्रम के साथ उल्टा हुआ।

उनका मानना था कि फिल्म पूरी तरह हीरोइन केंद्रित थी।

दर्शकों और समीक्षकों का ध्यान लक्ष्मी पर रहा।

फिल्म का भावनात्मक भार भी उन्हीं के कंधों पर था।

विक्रम ने बाद में कई इंटरव्यू में कहा कि

“जूली मेरे करियर की सबसे बड़ी गलती थी।”

उनका कहना था कि सुपरहिट फिल्म में अभिनेता की पहचान भी सुपरहिट होनी चाहिए।

लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ।

फिल्म का सारा श्रेय दूसरे कलाकारों को मिला।

यहां तक कि क्लाइमैक्स में भी दर्शकों का ध्यान उत्पल दत्त के किरदार पर चला गया।

उनके अनुसार, “जूली” रिलीज होने से पहले उन्होंने लगभग 20 से 25 फिल्में साइन की थीं।

मगर फिल्म रिलीज होने के बाद उन्हें हीरो के रूप में नए प्रस्ताव मिलने बंद हो गए।


एक फिल्म जिसने बदल दी पहचान

धीरे-धीरे विक्रम को फिर काम मिलने लगा।

लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी थीं।

वह पहले जैसे रोमांटिक हीरो नहीं रहे।

इंडस्ट्री ने उन्हें चरित्र अभिनेता के रूप में स्वीकार करना शुरू कर दिया।

उनकी प्रतिभा पर किसी को संदेह नहीं था।

लेकिन उनकी स्क्रीन इमेज बदल चुकी थी।

यही कारण है कि आज भी फिल्म इतिहास की अनोखी घटनाओं में विक्रम मकानदार का नाम जरूर लिया जाता है।

एक ऐसे अभिनेता के रूप में, जिसने सुपरहिट फिल्म में काम किया, लेकिन उसी फिल्म ने उसके करियर की दिशा बदल दी।


मोईनुद्दीन से विक्रम बनने तक

31 मई 1947 को कर्नाटक के गडग में जन्मे विक्रम का असली नाम मोईनुद्दीन मकानदार था।

फिल्मों में आने के बाद उन्होंने विक्रम नाम अपनाया।

अभिनय के प्रति उनका जुनून उन्हें मुंबई ले आया।

उन्होंने संघर्ष किया।

मौके हासिल किए।

और पहचान भी बनाई।

हालांकि किस्मत ने उनके साथ एक अजीब खेल खेला।

जिस फिल्म को लोग आज भी क्लासिक मानते हैं,

उसी फिल्म को विक्रम अपने करियर की सबसे बड़ी भूल मानते रहे।

यही बॉलीवुड की सबसे दिलचस्प सच्चाइयों में से एक है।

यहां सफलता हमेशा वैसी नहीं होती, जैसी बाहर से दिखाई देती है।

कभी-कभी तालियों की गूंज के पीछे एक कलाकार का अधूरा सपना भी छिपा होता है।

और विक्रम मकानदार की कहानी उसी अधूरे सपने की कहानी है।

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