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जब एक पारसी पत्रकार ने हिंदू समाज की कुरीतियों को खुलकर ललकारा! बेहरामजी मालाबारी की वो लड़ाई जिसने भारत बदल दिया

जब एक पारसी पत्रकार ने हिंदू समाज की कुरीतियों को खुलकर ललकारा! बेहरामजी मालाबारी की वो लड़ाई जिसने भारत बदल दिया
जब एक पारसी पत्रकार ने हिंदू समाज की कुरीतियों को खुलकर ललकारा! बेहरामजी मालाबारी की वो लड़ाई जिसने भारत बदल दिया

19वीं सदी का भारत कई सामाजिक बंधनों में जकड़ा हुआ था।
बाल विवाह आम बात थी।
विधवाओं का जीवन किसी सजा से कम नहीं माना जाता था।
औरतों की आवाज़ घर की दीवारों में दबकर रह जाती थी।

ऐसे समय में एक व्यक्ति सामने आया।

वह न कोई राजा था, न कोई धार्मिक गुरु।
वह एक पारसी पत्रकार, कवि और समाज सुधारक था।

नाम था — Behramji Malabari।

उसने खुलकर कहा कि बच्चियों की शादी एक सामाजिक अपराध है।
उसने विधवाओं के पुनर्विवाह की मांग उठाई।
उसने उस व्यवस्था को “वैवाहिक गुलामी” तक कह दिया।

लेकिन उसकी यह आवाज़ कई लोगों को चुभने लगी।

लोग पूछने लगे —
“एक पारसी आखिर हिंदू समाज को सुधारने वाला कौन होता है?”

फिर भी बेहरामजी पीछे नहीं हटे।
उन्होंने वही कहा, जो उस दौर में बोलना खतरे से खाली नहीं था।

OLDISGOLDFILMS आज आपको उस इंसान की कहानी बता रहा है, जिसने अकेले समाज की सोच को चुनौती दी थी।


गरीबी, संघर्ष और बचपन का दर्द

Behramji Malabari का जन्म 18 मई 1853 को बड़ौदा में हुआ था।

उनके पिता एक साधारण क्लर्क थे।
घर में आर्थिक तंगी थी।

जब वह बहुत छोटे थे, तब घरेलू हिंसा के कारण उनकी मां को पति से अलग होना पड़ा।
कुछ समय बाद उनकी मां ने दूसरी शादी कर ली।

लेकिन किस्मत ने यहां भी उनका साथ नहीं दिया।

महज 12 साल की उम्र में उनकी मां की मौत हैजा से हो गई।
अचानक बेहरामजी अकेले पड़ गए।

जीवन चलाने के लिए उन्हें मुंबई जाना पड़ा।

वह बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ाने लगे।
धीरे-धीरे उनकी आय बढ़ने लगी।

लेकिन पढ़ाई में गणित हमेशा उनकी कमजोरी रही।
तीन बार असफल होने के बाद उन्होंने परीक्षा पास की।

इसी संघर्ष ने उनके भीतर संवेदनशीलता पैदा की।
उन्हें गरीबों, महिलाओं और समाज के कमजोर वर्गों का दर्द समझ आने लगा।


एक शिक्षक ने पहचान लिया छुपा हुआ कवि

बेहरामजी की जिंदगी तब बदली, जब उनके शिक्षक Joseph Taylor ने उनकी कविताएं पढ़ीं।

उन्होंने महसूस किया कि यह युवक साधारण नहीं है।

उनकी कविताओं में दर्द था।
समाज की सच्चाई थी।
और बदलाव की आग भी थी।

इसके बाद उन्हें John Wilson से मिलवाया गया।

विल्सन उनकी प्रतिभा से बेहद प्रभावित हुए।
उन्होंने बेहरामजी की पहली पुस्तक Niti Vinod प्रकाशित कराने में मदद की।

1875 में प्रकाशित यह किताब काफी चर्चित हुई।
सरकार ने इसकी सैकड़ों प्रतियां खरीदीं।

यहीं से बेहरामजी मालाबारी एक कवि के रूप में पहचाने जाने लगे।

लेकिन उनका असली संघर्ष अभी शुरू होना बाकी था।


कवि से पत्रकार बनने का फैसला

बेहरामजी कविता से बेहद प्यार करते थे।
उन्हें लगता था कि गीतों और कविताओं के जरिए वह समाज बदल सकते हैं।

लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि बदलाव के लिए शब्दों को हथियार बनाना होगा।

इसीलिए उन्होंने पत्रकारिता चुनी।

1880 में उन्होंने The Indian Spectator नाम का अखबार संभाला।

धीरे-धीरे यह अखबार पूरे भारत में चर्चित हो गया।

उनके लेखों में साहस दिखाई देता था।
वह अंग्रेज़ सरकार की भी आलोचना करते थे।
साथ ही भारतीय समाज की कुरीतियों पर भी सवाल उठाते थे।

उनकी लेखनी इतनी प्रभावशाली थी कि बड़े अंग्रेज़ी अखबार भी उनकी तारीफ करने लगे।

कई लोगों ने उन्हें शासकों और जनता के बीच एक ईमानदार आवाज़ बताया।


जब उन्होंने बाल विवाह को कहा “वैवाहिक गुलामी”

उस दौर में छोटी बच्चियों की शादी कर दी जाती थी।
कई लड़कियां किशोरावस्था से पहले ही विधवा बन जाती थीं।

उनका पूरा जीवन सफेद कपड़ों, सामाजिक अपमान और अकेलेपन में गुजरता था।

Behramji Malabari यह सब देखकर विचलित हो गए।

उन्होंने खुलकर कहा कि यह परंपरा नहीं, अत्याचार है।

उन्होंने “Notes on Child Marriage and Widow Remarriage” नामक लेख लिखा।
इसमें उन्होंने उन सामाजिक प्रथाओं पर तीखा हमला बोला, जो महिलाओं को अधिकारों से दूर रखती थीं।

उन्होंने लिखा कि एक विधवा का जीवन समाज की असफलता है।
वह दूसरों की दया पर जीने को मजबूर होती है।

उनकी यह बात उस समय बहुत बड़ी चुनौती मानी गई।
क्योंकि धर्म और परंपरा के खिलाफ बोलना आसान नहीं था।


जब बाल गंगाधर तिलक भी उनसे नाराज़ हो गए

बेहरामजी की बातों से समाज में बड़ी बहस छिड़ गई।

कुछ लोग उनका समर्थन कर रहे थे।
लेकिन कई बड़े नेता उनसे नाराज़ थे।

Bal Gangadhar Tilak ने कहा कि हिंदू शास्त्रों को समझने और उन पर टिप्पणी करने का अधिकार सिर्फ हिंदुओं को है।

उनके अनुसार एक पारसी व्यक्ति हिंदू समाज के मामलों में दखल नहीं दे सकता।

बेहरामजी को “अंग्रेज़ों का समर्थक” तक कहा गया।
उनकी पश्चिमी सोच पर सवाल उठाए गए।

लेकिन उन्होंने अपनी मुहिम नहीं छोड़ी।

उन्हें लगता था कि अगर किसी परंपरा से महिलाओं का जीवन बर्बाद हो रहा है, तो उसके खिलाफ बोलना जरूरी है।


रुख्माबाई केस जिसने पूरे देश को हिला दिया

Behramji Malabari की सबसे बड़ी लड़ाई शायद Rukhmabai केस में दिखाई दी।

रुख्माबाई की शादी सिर्फ 11 साल की उम्र में कर दी गई थी।

बड़े होने पर उन्होंने पति के साथ रहने से इनकार कर दिया।

इसके बाद उनके पति ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

Bombay High Court ने आदेश दिया कि रुख्माबाई पति के पास लौटें, वरना उन्हें जेल भेजा जा सकता है।

यह फैसला सुनकर बेहरामजी आगबबूला हो गए।

उन्होंने अपने लेखों में अदालत और सरकार दोनों की आलोचना की।

उन्होंने कहा कि सरकार बच्चियों की जबरन शादी कराने वालों की मदद कर रही है।
उन्होंने इस फैसले को अन्याय बताया।

उनकी मुहिम भारत से निकलकर ब्रिटेन तक पहुंची।

आखिरकार Queen Victoria के हस्तक्षेप के बाद रुख्माबाई को राहत मिली।

यही वह आंदोलन था, जिसने आगे चलकर Age of Consent Act 1891 का रास्ता तैयार किया।

इस कानून ने सहमति की उम्र 10 से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दी।

आज यह संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन उस दौर में यह बहुत बड़ा सामाजिक बदलाव था।


समाज सुधार के पीछे छिपा उनका बड़ा सपना

बेहरामजी सिर्फ कानून बदलना नहीं चाहते थे।
वह समाज की सोच बदलना चाहते थे।

उनका मानना था कि असली बदलाव गांवों और घरों में होगा।

उन्होंने कहा था कि भारत का भविष्य सिर्फ अखबारों की बहसों से नहीं बनेगा।
इसके लिए समाज के बीच जाकर काम करना होगा।

इसी सोच के साथ उन्होंने 1908 में Seva Sadan की स्थापना की।

यह संस्था उन महिलाओं की मदद करती थी, जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया था।

यहां महिलाओं को शिक्षा दी जाती थी।
उन्हें चिकित्सा और सहारा भी मिलता था।

उस दौर में यह कदम बेहद क्रांतिकारी माना गया।


आज भी क्यों याद किए जाते हैं बेहरामजी मालाबारी?

समय के साथ कई लोग इतिहास के पन्नों में खो जाते हैं।
लेकिन कुछ नाम अपने विचारों से हमेशा जिंदा रहते हैं।

Behramji Malabari उन्हीं नामों में शामिल हैं।

उन्होंने उस समय महिलाओं के अधिकारों की बात की, जब समाज उन्हें सुनने को तैयार नहीं था।

उन्होंने धर्म से ऊपर इंसानियत को रखा।
उन्होंने समाज से पूछा—

“औरतों को इंसान की तरह जीने का अधिकार आखिर कब मिलेगा?”

आज जब महिलाओं के अधिकारों पर चर्चा होती है, तब मालाबारी की लड़ाई और भी महत्वपूर्ण लगती है।

क्योंकि उन्होंने साबित किया था कि बदलाव की शुरुआत अक्सर एक अकेली आवाज़ से होती है।

OLDISGOLDFILMS आपको ऐसे ही भूले-बिसरे नायकों की कहानियां सुनाता रहेगा, जिन्होंने भारत को अंदर से बदलने का साहस किया।

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