
भारत की आज़ादी की कहानी में कई नाम चमकते हैं।
महात्मा गांधी, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह…
लेकिन इतिहास की धूल में कुछ चेहरे ऐसे भी दब गए, जिन्होंने अपने समय में उतना ही बड़ा संघर्ष किया था।
ऐसा ही एक नाम था — Bhimbor Deori।
आज शायद बहुत कम लोग उन्हें जानते हैं।
न स्कूल की किताबों में उनका ज़िक्र होता है, न टीवी डिबेट्स में।
लेकिन एक समय ऐसा था, जब उत्तर-पूर्व की राजनीति में उनकी आवाज़ इतनी मजबूत थी कि दिल्ली तक उसे नजरअंदाज नहीं कर सकती थी।
वो सिर्फ एक नेता नहीं थे।
वो उस दौर की चेतावनी थे, जब पहचान, जमीन और संस्कृति धीरे-धीरे राजनीति के खेल में बदल रही थी।
और सबसे हैरान करने वाली बात?
उन्होंने उस समय Muhammad Ali Jinnah और मुस्लिम लीग की उस योजना का विरोध किया, जिसमें असम और उत्तर-पूर्व को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने की कोशिश हो रही थी।
जब उत्तर-पूर्व का भविष्य दांव पर लगा था
1946 का समय था।
भारत की आज़ादी करीब थी, लेकिन साथ ही देश के बंटवारे की आहट भी तेज हो चुकी थी।
दिल्ली में नक्शे बनाए जा रहे थे।
सीमाएं तय हो रही थीं।
राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से भारत को बांटने की तैयारी कर रहे थे।
उसी समय मुस्लिम लीग चाहती थी कि असम और उत्तर-पूर्व के कुछ हिस्से पाकिस्तान में शामिल हों।
उनका तर्क था कि यहां की जनसंख्या और राजनीतिक हालात उनके पक्ष में जा सकते हैं।
लेकिन शायद उन्होंने यह नहीं सोचा था कि एक आदिवासी नेता खुलकर उनके सामने खड़ा हो जाएगा।
वो थे भिमबोर देउरी।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि असम सिर्फ राजनीतिक नक्शे का हिस्सा नहीं है।
ये उन समुदायों की धरती है, जिन्होंने सदियों तक जंगलों को बसाया, नदियों के किनारे सभ्यताएं खड़ी कीं और अपनी संस्कृति को बचाकर रखा।
उस समय उनका विरोध करना बेहद बड़ा जोखिम था।
क्योंकि सत्ता, प्रशासन और कई प्रभावशाली ताकतें उनके खिलाफ थीं।
फिर भी उन्होंने झुकने से इनकार कर दिया।
कई इतिहासकार मानते हैं कि उत्तर-पूर्व को भारत के साथ बनाए रखने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी।
लेकिन समय के साथ उनका नाम इतिहास के पन्नों से गायब होता चला गया।
आखिर कौन थे भिमबोर देउरी?
Bhimbor Deori असम के प्राचीन देउरी समुदाय से आते थे।
यह समुदाय ब्रह्मपुत्र घाटी के सबसे पुराने आदिवासी समाजों में गिना जाता है।
उस समय उत्तर-पूर्व में तेजी से बदलाव हो रहे थे।
बाहरी प्रभाव बढ़ रहे थे।
स्थानीय समुदाय अपनी जमीन और संस्कृति खोने लगे थे।
भिमबोर देउरी ने बहुत जल्दी समझ लिया था कि सिर्फ अंग्रेजों से आज़ादी मिलना काफी नहीं होगा।
अगर लोगों की जमीन छिन गई, तो उनकी पहचान भी खत्म हो जाएगी।
यही सोच उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती थी।
वो सिर्फ भाषण देने वाले नेता नहीं थे।
वो गांवों में जाते थे।
लोगों से सीधे बात करते थे।
उनकी परेशानियां सुनते थे।
धीरे-धीरे वो उत्तर-पूर्व के आदिवासी आंदोलन की सबसे मजबूत आवाज बन गए।
जब अंग्रेजों ने अहोम इतिहास पर सवाल उठाया
1942 में Stafford Cripps भारत आए थे।
देश में राजनीतिक बातचीत का दौर चल रहा था।
इसी दौरान एक बेहद दिलचस्प बहस हुई।
अंग्रेज अधिकारियों ने तर्क दिया कि अगर अहोम लोग कभी बाहर से आकर असम में बस सकते हैं, तो अंग्रेजों को बाहरी क्यों माना जाए?
यह सिर्फ सवाल नहीं था।
यह उत्तर-पूर्व की पहचान पर सीधा हमला था।
लेकिन भिमबोर देउरी ने बेहद शांत और मजबूत जवाब दिया।
उन्होंने कहा कि अहोम लोग बाहर से जरूर आए थे, लेकिन उन्होंने खुद को असम की मिट्टी में मिला दिया।
उन्होंने यहां की संस्कृति अपनाई।
स्थानीय समाज के साथ जीवन बिताया।
जबकि अंग्रेज सिर्फ शासन करने आए थे।
उन्होंने संसाधनों का इस्तेमाल किया, लोगों को बांटा और सत्ता चलाई।
लेकिन कभी इस धरती का हिस्सा नहीं बने।
उनका यह जवाब सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ नहीं था।
यह पूरी औपनिवेशिक सोच के खिलाफ एक ऐतिहासिक तर्क था।
जमीन सिर्फ जमीन नहीं होती… पहचान होती है
भिमबोर देउरी बार-बार जमीन की बात करते थे।
क्योंकि वो जानते थे कि जमीन खोने का मतलब भविष्य खोना है।
उस दौर में बाहरी लोगों को लगातार जमीन दी जा रही थी।
जबकि स्थानीय किसान और आदिवासी समुदाय संघर्ष कर रहे थे।
उन्होंने इसका खुलकर विरोध किया।
उन्होंने कहा कि अगर आदिवासी समुदाय अपनी जमीन खो देंगे, तो उनकी भाषा, संस्कृति और अस्तित्व भी खत्म हो जाएगा।
इसीलिए उन्होंने ट्राइबल बेल्ट और ब्लॉक जैसी व्यवस्थाओं की मांग उठाई, ताकि स्थानीय समुदायों की सुरक्षा हो सके।
आज जब उत्तर-पूर्व में जमीन, संसाधनों और पहचान को लेकर विवाद बढ़ रहे हैं, तब उनकी बातें और ज्यादा सच लगती हैं।
क्या आज भी वही राजनीति दोहराई जा रही है?
आज उत्तर-पूर्व तेजी से बदल रहा है।
नई सड़कें बन रही हैं।
कॉर्पोरेट निवेश बढ़ रहा है।
लेकिन साथ ही पहचान की राजनीति भी तेज होती जा रही है।
समुदायों के बीच दूरी बढ़ रही है।
स्थानीय लोग अपनी जमीन और संसाधनों को लेकर चिंतित हैं।
भिमबोर देउरी ने दशकों पहले चेतावनी दी थी कि लोगों को आपस में लड़ाया जाएगा, ताकि असली मुद्दे पीछे छूट जाएं।
आज भी वही सवाल मौजूद हैं—
जंगल किसके रहेंगे?
नदियों पर अधिकार किसका होगा?
स्थानीय फैसले कौन लेगा?
और विकास के नाम पर क्या पहचान मिटाई जा सकती है?
यही कारण है कि कई लोग मानते हैं कि उनका संघर्ष आज भी अधूरा है।
उनकी सबसे बड़ी सोच क्या थी?
भिमबोर देउरी की सबसे बड़ी सोच बेहद सरल लेकिन गहरी थी।
उन्होंने माना कि पहचान सिर्फ सरकारी कागजों से तय नहीं होती।
असल पहचान संस्कृति, इतिहास और जमीन से जुड़ाव से बनती है।
उनके लिए आदिवासी होना सिर्फ एक प्रशासनिक श्रेणी नहीं था।
वो जीवन का तरीका था।
सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने कभी नफरत की राजनीति का समर्थन नहीं किया।
वो संघर्ष चाहते थे, लेकिन विभाजन नहीं।
वो चाहते थे कि उत्तर-पूर्व के लोग मिलकर अपने अधिकारों की रक्षा करें।
आखिर इतिहास ने उन्हें भुला क्यों दिया?
यह सवाल आज भी लोगों को परेशान करता है।
इतना बड़ा योगदान देने वाला नेता आखिर इतिहास से गायब कैसे हो गया?
कई इतिहासकार मानते हैं कि सत्ता अक्सर उन्हीं चेहरों को आगे बढ़ाती है, जो उसकी बनाई कहानी में फिट बैठते हों।
भिमबोर देउरी की राजनीति अलग थी।
वो जमीन, आदिवासी अधिकार और असली स्वायत्तता की बात करते थे।
उनकी सोच सत्ता के लिए असहज थी।
शायद यही वजह है कि धीरे-धीरे उनका नाम मुख्यधारा के इतिहास से गायब कर दिया गया।
लेकिन इतिहास पूरी तरह कभी खत्म नहीं होता।
कुछ नाम मिटते नहीं हैं।
वो बस सही समय आने पर फिर लौट आते हैं।
आज फिर क्यों जरूरी है उन्हें याद करना?
आज उत्तर-पूर्व एक नए मोड़ पर खड़ा है।
पहचान की लड़ाई तेज हो चुकी है।
जंगल और पहाड़ लगातार खतरे में हैं।
स्थानीय समुदाय अपने अधिकारों को लेकर चिंतित हैं।
ऐसे समय में भिमबोर देउरी की सोच नई दिशा दे सकती है।
उन्होंने कहा था कि असली लड़ाई एक-दूसरे से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से है जो लोगों को बांटती है।
उनकी राजनीति नफरत की नहीं थी।
वो सम्मान, साझेदारी और अस्तित्व की राजनीति थी।
शायद यही कारण है कि आज उनकी कहानी फिर सुनाई जानी चाहिए।
ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि उत्तर-पूर्व की पहचान सिर्फ सीमाओं से नहीं बनी।
बल्कि उन लोगों के संघर्ष से बनी, जिन्होंने अपनी मिट्टी बचाने के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया।
OLDISGOLDFILMS हमेशा ऐसी भूली हुई कहानियों को सामने लाने की कोशिश करता है।
क्योंकि इतिहास सिर्फ राजाओं का नहीं होता।
कई बार असली इतिहास उन लोगों में छिपा होता है, जिन्हें दुनिया भूल चुकी होती है।
#BhimborDeori #NorthEastIndia #AssamHistory #TribalHistory #OLDISGOLDFILMS
