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पिता नहीं थे, फिर भी बना आज़ादी का स्तंभ… मोतीलाल नेहरू की वो कहानी, जो कम लोग जानते हैं | OLDISGOLDFILMS

पिता नहीं थे, फिर भी बना आज़ादी का स्तंभ… मोतीलाल नेहरू की वो कहानी, जो कम लोग जानते हैं | OLDISGOLDFILMS
पिता नहीं थे, फिर भी बना आज़ादी का स्तंभ… मोतीलाल नेहरू की वो कहानी, जो कम लोग जानते हैं | OLDISGOLDFILMS

एक ऐसा जन्म, जिसने संघर्ष को ही साथी बना लिया.

6 मई 1861। आगरा की धरती पर एक बच्चे ने जन्म लिया। लेकिन उस बच्चे के सिर पर पिता का साया नहीं था। जन्म से पहले ही पिता गंगाधर नेहरू इस दुनिया को छोड़ चुके थे। उस दौर में बिना पिता के जीवन आसान नहीं था। हर कदम पर मुश्किलें थीं। परिवार पर जिम्मेदारियों का बोझ था। लेकिन बड़े भाई नंदलाल नेहरू ने हार नहीं मानी। उन्होंने छोटे भाई को सिर्फ संभाला नहीं, बल्कि उन्हें मजबूत भी बनाया। मोतीलाल नेहरू बचपन से ही तेज दिमाग के थे। पढ़ाई में उनकी गहरी रुचि थी। अंग्रेजों के शासन में भारतीयों के लिए अवसर कम थे। फिर भी उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की। धीरे-धीरे उनका नाम इलाहाबाद की अदालतों में गूंजने लगा। उनकी दलीलें इतनी प्रभावशाली थीं कि बड़े-बड़े अंग्रेज अधिकारी भी चुप हो जाते थे। लोग उन्हें सिर्फ वकील नहीं मानते थे। वे एक प्रभावशाली व्यक्तित्व बन चुके थे। लेकिन उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यही व्यक्ति एक दिन अपनी पूरी शानो-शौकत देश के लिए छोड़ देगा।

आनंद भवन… जहां शाही जिंदगी सांस लेती थी.

इलाहाबाद का आनंद भवन सिर्फ एक मकान नहीं था। वह उस दौर की शाही जिंदगी का प्रतीक था। वहां विदेशी फर्नीचर था। शानदार गाड़ियां थीं। नौकर-चाकर हर समय मौजूद रहते थे। बड़ी-बड़ी पार्टियां होती थीं। अंग्रेज अधिकारी भी वहां आते थे। मोतीलाल नेहरू उस समय भारत के सबसे अमीर वकीलों में गिने जाते थे। उनका जीवन किसी राजा से कम नहीं था। लेकिन जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती। कभी-कभी एक घटना इंसान की सोच बदल देती है। 1919 में वही हुआ। Jallianwala Bagh massacre ने पूरे देश को झकझोर दिया। निर्दोष लोगों को गोलियों से भून दिया गया। हर भारतीय के दिल में गुस्सा था। मोतीलाल नेहरू भी भीतर से टूट गए। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि अंग्रेज सिर्फ शासन नहीं कर रहे थे, बल्कि भारतीयों की आत्मा कुचल रहे थे। इसी समय Mahatma Gandhi का प्रभाव बढ़ रहा था। गांधीजी का सादा जीवन उन्हें भीतर तक प्रभावित करने लगा। धीरे-धीरे उनके मन में बदलाव शुरू हो गया।

जब लाखों की वकालत छोड़ दी गई.

एक समय ऐसा भी आया, जब मोतीलाल नेहरू ने खुद को आईने में देखा। उन्होंने महसूस किया कि देश गुलाम है और वे ऐशो-आराम में जी रहे हैं। यह एहसास उन्हें बेचैन करने लगा। फिर उन्होंने ऐसा फैसला लिया, जिसने सबको चौंका दिया। उन्होंने अपनी सफल वकालत छोड़ दी। विदेशी कपड़ों को आग लगा दी। खादी पहनना शुरू किया। आनंद भवन की चमक अचानक बदलने लगी। जहां पहले अंग्रेजी ठाठ दिखाई देता था, वहां अब स्वदेशी की आवाज सुनाई देने लगी। यह बदलाव आसान नहीं था। उनके कई करीबी लोगों ने विरोध किया। कुछ ने कहा कि यह पागलपन है। लेकिन मोतीलाल नेहरू पीछे नहीं हटे। उन्होंने समझ लिया था कि देशभक्ति सिर्फ भाषणों से नहीं आती। उसके लिए त्याग करना पड़ता है। यही कारण था कि उनका नाम धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े नेताओं में गिना जाने लगा।

बेटे ने दिखाई राह… और पिता ने बदल दी जिंदगी.

Jawaharlal Nehru पहले ही गांधीजी के विचारों से प्रभावित हो चुके थे। वे आंदोलन में कूद चुके थे। लेकिन शुरुआत में मोतीलाल नेहरू इस रास्ते को लेकर असमंजस में थे। वे मानते थे कि अंग्रेजों से अधिकार बातचीत से लिए जा सकते हैं। वे संवैधानिक तरीकों पर भरोसा करते थे। लेकिन समय बदल रहा था। देश में गुस्सा बढ़ रहा था। युवा अब समझौते नहीं चाहते थे। ऐसे समय में पिता और बेटे के विचार अलग दिखाई देने लगे। फिर एक दिन मोतीलाल नेहरू ने अपने बेटे की आंखों में वही जुनून देखा, जो देशभर के युवाओं में था। उन्होंने महसूस किया कि अब पुरानी सोच बदलनी होगी। इसके बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह आंदोलन में झोंक दिया। यह सिर्फ राजनीतिक बदलाव नहीं था। यह एक पिता का भावनात्मक परिवर्तन भी था। यही कारण था कि नेहरू परिवार स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र बन गया।

जेल की सलाखों के पीछे बदलती सोच.

1921 में मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू दोनों गिरफ्तार कर लिए गए। अंग्रेज सरकार यह संदेश देना चाहती थी कि आंदोलन को दबाया जाएगा। दोनों को छह महीने की सजा मिली। जेल का जीवन आसान नहीं था। वहां न कोई आराम था और न कोई सुविधा। लेकिन जेल ने उन्हें और मजबूत बना दिया। उन्होंने महसूस किया कि आजादी की कीमत बहुत बड़ी है। इसी दौरान Chauri Chaura incident हुआ। इसके बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। कई नेता नाराज हो गए। उन्हें लगा कि आंदोलन रुक गया। लेकिन मोतीलाल नेहरू ने धैर्य रखा। उन्होंने समझा कि हर लड़ाई सिर्फ गुस्से से नहीं जीती जाती। कभी-कभी रणनीति बदलनी पड़ती है। जेल से निकलने के बाद उनकी सोच और भी परिपक्व हो चुकी थी।

स्वराज पार्टी… जिसने अंग्रेजों को भीतर से चुनौती दी.

जेल से बाहर आने के बाद मोतीलाल नेहरू ने नया रास्ता चुना। उन्होंने Chittaranjan Das के साथ मिलकर स्वराज पार्टी बनाई। यह कदम बेहद अलग था। उनका मानना था कि अंग्रेजों को उनके ही सिस्टम में घुसकर चुनौती देनी चाहिए। उन्होंने केंद्रीय विधानसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका निभाई। वहां उनके भाषण अंग्रेजों को असहज कर देते थे। वे कानून के हर पहलू को गहराई से समझते थे। इसलिए ब्रिटिश सरकार के फैसलों की कमजोरियां खुलकर सामने आने लगीं। पहली बार भारतीय नेता अंग्रेजों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे रहे थे। हालांकि बाद में अंग्रेजों की वीटो पावर ने इस प्रयास को कमजोर कर दिया। लेकिन स्वराज पार्टी ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी। इसने यह साबित किया कि लड़ाई सिर्फ सड़कों पर नहीं, संसद के भीतर भी लड़ी जा सकती है।

नेहरू रिपोर्ट… जिसने भविष्य का भारत दिखाया.

1927 में Simon Commission भारत आया। सबसे बड़ी बात यह थी कि उसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। पूरे देश में गुस्सा फैल गया। लोग इसे अपमान मान रहे थे। ऐसे समय में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई। इस समिति ने ‘नेहरू रिपोर्ट’ तैयार की। यह रिपोर्ट सिर्फ एक दस्तावेज नहीं थी। यह भविष्य के भारत का सपना थी। इसमें समान अधिकारों की बात की गई। धर्मनिरपेक्षता की बात की गई। शिक्षा और न्याय को महत्व दिया गया। उस दौर में यह सोच बेहद आधुनिक मानी जाती थी। कई लोग मानते हैं कि भारत के संविधान की नींव उसी समय रखी गई थी। मोतीलाल नेहरू ने दिखाया कि वे सिर्फ आंदोलनकारी नहीं थे। वे दूरदर्शी नेता भी थे।

आनंद भवन का त्याग… जिसने सबको भावुक कर दिया.

1930 में Gandhi जी ने दांडी मार्च शुरू किया। पूरा देश आंदोलन की आग में जल रहा था। इसी समय मोतीलाल नेहरू ने ऐसा फैसला लिया, जिसने इतिहास बना दिया। उन्होंने आनंद भवन देश को समर्पित कर दिया। यह वही घर था, जहां कभी शाही पार्टियां होती थीं। अब वही घर स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र बनने जा रहा था। यह त्याग सिर्फ संपत्ति का नहीं था। यह सोच का त्याग था। उन्होंने साबित किया कि देश सबसे ऊपर होता है। आनंद भवन बाद में कई ऐतिहासिक बैठकों का गवाह बना। वहां से आजादी की लड़ाई की नई रणनीतियां बनीं। आज भी वह घर इतिहास की याद दिलाता है।

आखिरी सफर… और देश की आंखों में आंसू.

6 फरवरी 1931। लखनऊ से एक दुखद खबर आई। मोतीलाल नेहरू अब इस दुनिया में नहीं रहे। देश उस समय कठिन दौर से गुजर रहा था। ऐसे समय में उनका जाना एक बड़ा झटका था। Subhas Chandra Bose ने इसे राष्ट्रीय आपदा कहा। Mahatma Gandhi भी बेहद दुखी थे। उन्होंने माना कि देश ने एक मजबूत स्तंभ खो दिया। उनके अंतिम दिनों में शरीर कमजोर हो चुका था। लेकिन देश के लिए उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने आखिरी सांस तक भारत की आजादी का सपना देखा। यही कारण है कि उनका नाम आज भी सम्मान से लिया जाता है।

एक विरासत… जो आज भी प्रेरणा देती है.

मोतीलाल नेहरू की कहानी सिर्फ राजनीति की कहानी नहीं है। यह त्याग, संघर्ष और बदलाव की कहानी है। उन्होंने साबित किया कि इंसान चाहे कितनी भी ऊंचाई पर पहुंच जाए, देश उससे बड़ा होता है। उन्होंने अपनी दौलत छोड़ी। अपनी आरामदायक जिंदगी छोड़ी। लेकिन देश के लिए कभी पीछे नहीं हटे। आज भी उनका जीवन हमें यही सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में दिखाई देती है। शायद यही कारण है कि इतिहास के इतने साल बाद भी उनका नाम लोगों के दिलों में जिंदा है। OLDISGOLDFILMS हमेशा ऐसी कहानियां सामने लाता रहेगा, जो इतिहास के पन्नों में कहीं दब गई हैं।

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