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जब पिता ने कमरे में बंद किया, तब जन्म हुआ बॉलीवुड के सबसे खतरनाक विलेन का, जिसने ‘महारानी’ बनकर पूरे देश को डरा दिया

जब पिता ने कमरे में बंद किया, तब जन्म हुआ बॉलीवुड के सबसे खतरनाक विलेन का, जिसने ‘महारानी’ बनकर पूरे देश को डरा दिया
जब पिता ने कमरे में बंद किया, तब जन्म हुआ बॉलीवुड के सबसे खतरनाक विलेन का, जिसने ‘महारानी’ बनकर पूरे देश को डरा दिया

बॉलीवुड में हर दौर में कई चेहरे आए। कुछ सितारे चमके और फिर गायब हो गए। लेकिन कुछ कलाकार ऐसे भी हुए, जो पर्दे से उतरने के बाद भी लोगों के दिलों में जिंदा रहे। सदाशिव अमरापुरकर उन्हीं कलाकारों में शामिल थे। उनका नाम सुनते ही लोगों के सामने कई चेहरे घूम जाते हैं। कभी ‘अर्ध सत्य’ का खतरनाक रामा शेट्टी, तो कभी ‘सड़क’ की डरावनी महारानी।

उनकी आंखों में अजीब सा डर था। आवाज में गहराई थी। और अभिनय में ऐसा सच था, जिसे देखकर दर्शक सहम जाते थे। मगर उनकी असली कहानी फिल्मों से कहीं ज्यादा संघर्ष भरी थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि एक समय ऐसा भी आया था, जब उनके अपने पिता ने उन्हें कमरे में बंद कर दिया था। परिवार चाहता था कि वह जिम्मेदारियां निभाएं। लेकिन सदाशिव की दुनिया थिएटर में बस चुकी थी। अभिनय उनके लिए सिर्फ शौक नहीं था। वह उनकी जिंदगी बन चुका था।

OLDISGOLDFILMS आज आपको उस कलाकार की कहानी बता रहा है, जिसने बंद कमरे से निकलकर बॉलीवुड के इतिहास में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज कर दिया।

कॉलेज के मंच पर शुरू हुई थी वह आग, जिसने बाद में बॉलीवुड हिला दिया

11 मई 1950 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में जन्मे सदाशिव अमरापुरकर बचपन से ही सामान्य बच्चों जैसे नहीं थे। उन्हें किताबों से ज्यादा मंच पसंद था। लोगों की नकल करना उन्हें अच्छा लगता था। कॉलेज पहुंचते-पहुंचते उनका झुकाव थिएटर की तरफ बढ़ने लगा।

युवा महोत्सवों में वह लगातार हिस्सा लेने लगे। वहीं पहली बार उन्होंने मंच पर अभिनय किया। दर्शकों ने तालियां बजाईं। उन्हें पुरस्कार मिला। और उसी दिन उन्हें समझ आ गया कि उनकी असली पहचान क्या है।

धीरे-धीरे थिएटर उनका जुनून बन गया। वह घंटों रिहर्सल करते थे। हर किरदार को जीने की कोशिश करते थे। उस समय थिएटर में पैसा नहीं था। संघर्ष बहुत था। लेकिन उनके अंदर अभिनय की भूख बढ़ती जा रही थी।

लोग कहते थे कि जब सदाशिव मंच पर आते थे, तो पूरा हॉल शांत हो जाता था। दर्शक किरदार में खो जाते थे। शायद यही ताकत उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाती थी।

जब पिता ने कमरे में बंद कर दिया, लेकिन जुनून नहीं रोक पाए

सदाशिव अमरापुरकर की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब परिवार उनके थिएटर प्रेम से परेशान हो गया। उस समय उनकी शादी हो चुकी थी। बच्चे भी थे। परिवार चाहता था कि वह कोई स्थायी नौकरी करें। मगर सदाशिव का पूरा समय थिएटर में गुजरता था।

उनके पिता को डर था कि बेटा जिम्मेदारियों से दूर हो रहा है। एक दिन गुस्से में उन्होंने सदाशिव को कमरे में बंद कर दिया। उन्हें लगा कि शायद अब वह अभिनय छोड़ देंगे।

लेकिन वही बंद कमरा उनकी जिंदगी बदल गया। उस अकेलेपन में सदाशिव ने खुद को समझा। उन्होंने महसूस किया कि अभिनय उनके लिए सांस की तरह है। वह इससे दूर नहीं रह सकते।

बाद में उन्होंने साफ कहा था कि अगर उन्हें रोका भी गया, तब भी वह अभिनय नहीं छोड़ पाएंगे। शायद उसी दिन बॉलीवुड के एक महान अभिनेता का जन्म हुआ था।

पत्नी नौकरी करती रहीं, और वह थिएटर में सपने तलाशते रहे

संघर्ष का समय आसान नहीं था। थिएटर से ज्यादा कमाई नहीं होती थी। परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ रही थीं। मगर उनकी पत्नी सुनंदा करमाकर हर कदम पर उनके साथ खड़ी रहीं।

वह LIC में नौकरी करती थीं। घर संभालती थीं। और सदाशिव को थिएटर जारी रखने का हौसला देती थीं। यही वजह थी कि सदाशिव बिना रुके अपने सपनों का पीछा कर सके।

धीरे-धीरे महाराष्ट्र की नाटक प्रतियोगिताओं में उनका नाम फैलने लगा। लोग उनके अभिनय की चर्चा करने लगे। आयोजक उन्हें बुलाने लगे। पहली बार उन्हें लगा कि अभिनय सिर्फ जुनून नहीं, एक पेशा भी बन सकता है।

उन्हें शायद अंदाजा नहीं था कि जल्द ही बॉलीवुड उनके दरवाजे तक पहुंचने वाला है।

एक छोटा रोल बना पूरी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़

मुंबई में थिएटर करते समय उनकी मुलाकात मशहूर लेखक विजय तेंदुलकर से हुई। उसी दौरान गोविंद निहलानी फिल्म ‘अर्ध सत्य’ बना रहे थे। विजय तेंदुलकर ने सदाशिव से पूछा कि क्या वह एक छोटा रोल करना चाहेंगे।

सदाशिव ने तुरंत हां कह दिया। उन्हें नहीं पता था कि यही फैसला उनकी जिंदगी बदल देगा।

फिल्म रिलीज हुई और उनके ‘रामा शेट्टी’ किरदार ने तहलका मचा दिया। उनका अभिनय इतना असली लगा कि लोग डरने लगे। इंडस्ट्री अचानक उनके नाम से गूंजने लगी।

उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर अवॉर्ड मिला। और सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि फिल्म के बाद उन्हें लगभग 60 फिल्मों के ऑफर मिले।

एक थिएटर कलाकार अचानक बॉलीवुड का सबसे चर्चित चेहरा बन चुका था।

उन्हें पता ही नहीं था कि यश चोपड़ा कौन हैं

सफलता मिलने के बाद भी सदाशिव अमरापुरकर बेहद साधारण रहे। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि शुरुआती दिनों में उन्हें यह भी नहीं पता था कि यश चोपड़ा और बीआर चोपड़ा कौन हैं।

वह सिर्फ कलाकारों को पहचानते थे। दिलीप कुमार, मनोज कुमार और शम्मी कपूर जैसे सितारों के नाम जानते थे। लेकिन निर्देशक कौन है, यह उन्होंने कभी समझने की कोशिश नहीं की।

क्योंकि उनकी पूरी दुनिया थिएटर तक सीमित थी। उन्हें ग्लैमर में दिलचस्पी नहीं थी। उन्हें सिर्फ अभिनय से मतलब था।

शायद यही सादगी उनके किरदारों में दिखाई देती थी। वह अभिनय नहीं करते थे। वह किरदार को जीते थे।

‘सड़क’ की महारानी ने पूरे देश को डरा दिया

1991 में महेश भट्ट की फिल्म ‘सड़क’ रिलीज हुई। इस फिल्म में सदाशिव अमरापुरकर ने ‘महारानी’ का किरदार निभाया। यह किरदार एक किन्नर का था। लेकिन जिस तरह उन्होंने इसे निभाया, उसने पूरे देश को हिला दिया।

उनकी आंखें डर पैदा करती थीं। आवाज सुनते ही लोग सहम जाते थे। उनका हर संवाद लोगों के दिमाग में बस गया।

फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शक उस किरदार को भूल नहीं पाए। कहा जाता है कि फिल्मफेयर को उनके लिए अलग निगेटिव रोल कैटेगरी शुरू करनी पड़ी। और पहला अवॉर्ड भी सदाशिव को ही मिला।

धर्मेंद्र जैसे बड़े सितारे भी उनके अभिनय से बेहद प्रभावित हुए। बाद में उन्होंने सदाशिव के साथ कई फिल्मों में काम किया।

गांव के लिए दो सपने, जो कभी पूरे नहीं हो पाए

इतनी सफलता मिलने के बाद भी सदाशिव अपने गांव को नहीं भूले। उनके मन में हमेशा अमरापुर बसता था। वह अपने गांव में एक घर बनाना चाहते थे। उनका सपना था कि जिंदगी का आखिरी समय वहीं बिताएं।

सिर्फ इतना ही नहीं। वह गांव में एक म्यूजियम भी खोलना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए पैसे जमा करने शुरू कर दिए थे। वह चाहते थे कि आने वाली पीढ़ियां कला और संस्कृति को करीब से समझें।

लेकिन किस्मत को शायद कुछ और मंजूर था। उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। और उनके दोनों सपने अधूरे रह गए।

लोगों की मदद करते रहे, बदले में मार खानी पड़ी

सदाशिव सिर्फ अभिनेता नहीं थे। वह समाजसेवा में भी आगे रहते थे। कई एनजीओ के साथ मिलकर जरूरतमंदों की मदद करते थे।

2013 में मुंबई में पानी की भारी कमी थी। उसी समय कुछ लोग होली पर पानी बर्बाद कर रहे थे। सदाशिव ने उन्हें रोकने की कोशिश की।

लेकिन बात इतनी बढ़ गई कि लोगों ने उनकी पिटाई कर दी। यह घटना बेहद दुखद थी। फिर भी उन्होंने लोगों की मदद करना नहीं छोड़ा।

यही बात उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाती थी।

आखिरी सांस तक अभिनय से जुड़ा रहा उनका दिल

सदाशिव अमरापुरकर ने अपने करियर में 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। उन्होंने विलेन, कॉमेडी और भावुक किरदार हर रूप में खुद को साबित किया।

उनकी आखिरी फिल्मों में ‘बॉम्बे टॉकीज’ और ‘ढंगरवाडा’ शामिल थीं। 3 नवंबर 2014 को फेफड़ों के संक्रमण के कारण उनका निधन हो गया। वह सिर्फ 64 साल के थे।

लेकिन कलाकार कभी मरते नहीं। उनके किरदार हमेशा जिंदा रहते हैं। आज भी जब बॉलीवुड के सबसे खतरनाक और यादगार विलेन की बात होती है, तो सदाशिव अमरापुरकर का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है।

उन्होंने साबित किया कि अभिनय सिर्फ चेहरे से नहीं होता। अभिनय आत्मा से होता है।

OLDISGOLDFILMS आगे भी ऐसे कलाकारों की अनसुनी कहानियां लेकर आता रहेगा, जिन्होंने संघर्ष से इतिहास लिखा।

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