Amar Prem(1972)- The Classical Love Story Starring Rajesh Khanna & Sharmila Tagore- Oldisgold

कहानी की शुरुरात होती है पुष्पा से जो रोते हुए अपने पति के  घर से माँ के पास आती है। संतान का सुख न देने के कारण पुष्पा के पति ने दूसरी शादी कर ली और उसपे अत्याचार करने लगे।  पुष्पा सहती रही लेकिन घर छोड़ने का निर्णय तब लिया जब उसके पति ने पुष्पा को जलती लकड़ी से मारा और घर से निकल दिया। पड़ोसियों की अनबन के कारण पुष्पा को उसकी माँ, घर से निकल देती है। जब वह आत्महत्या करने की कोशिश करती है, तो उसे उसके गांव में चाचा, नेपाल बाबू (मदन पुरी) द्वारा कलकत्ता के एक वेश्यालय में बेच दिया जाता है। ऑडिशन पर, आनंद बाबू (राजेश खन्ना), जो प्यार की तलाश में एक बड़े व्यवसायी है, उसके गायन से आकर्षित होते है और तारीफ कर कहते है 'तुम्हरा नाम पुष्पा नहीं मीरा होना चाइये था'।  यहाँ से शुरू होता है पुष्पा के गणिका बनने का सफ़र |

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कुछ दिन बाद पुष्पा के गांव से उसका मुंहबोला भाई महेश आता है, पुष्पा अपने भाई का सत्कार करती है और उसके हाथ अपनी माँ को रूपए bhejne ko kehti hai tab Mahesh batata hai ki vo is duniya mein nahi hai।  आनंद बाबू भी वहां पुष्पा से मिलते है और रोटी पुष्पा से कहते है ' यहाँ तुम्हारे दुःख के आंसू  saline water I MEAN Namkeen pani के सिवा कुछ नहीं है इसलिए इन्हे पोंछ दो pushpa, I hate tears '
'Immortal Love '  यानी अमर प्रेम - 1972 में  शक्ति सामंत द्वारा निर्देशित एक भारतीय रोमांटिक ड्रामा फिल्म है। यह 1970 की बंगाली फिल्म 'निशि पद्मा' की रीमेक है, जिसका निर्देशन अरबिंद मुखर्जी ने किया था। पड़ोस के 8  साल के बच्चे का एक गणिका के प्रति माँ बेटे का शानदार उदाहरण देकर मानवीय मूल्यों और रिश्तों के पतन को चित्रित करती है

भाई महेश बाबू  का परिवार पुष्पा के पड़ोस में रहने आता है, पुष्पा खुशी से जब उनसे मिलने जाती है तो महेश बाबू पुष्पा को उससे और उसके परिवार के साथ बातचीत करने से मना करते हैं क्योंकि उसे डर है कि लोग क्या कहेंगे। नंदू महेश का बड़ा लड़का hai  जिसे उसकी सौतेली माँ बुरा व्यवहार करती है और अक्सर भूखा रखती है।  पुष्पा भी उसे माँ कि तरह स्नेह करती और मिठाई समोसे खिलाती hai वहीँ नंदू  bhi पुष्पा से दोस्ती कर लेता है ।
आनंद बाबू  एक बड़ा व्यापारी लेकिन एक नाखुश शादीशुदा और अकेला व्यक्ति  है जो पुष्पा से रोज़ाना मिलने जाता था। एक दिन, आनंद बाबू का देवर पुष्पा को देखने आता है और मांग करता है कि वह आनंद बाबू को उससे मिलने से रोकने के लिए कहे।

दुःखी मन के साथ, पुष्पा सहमत हो जाती है और जब आनंद बाबू पुष्पा  को देखने आता है तो वह उसे दूर कर देती है। तब व्यापारी आनंद बाबू को पता चलता है कि वह पुष्पा से प्यार करता है। वहीं नंदू पुष्पा के घर के आँगन में हारश्रिंगार का पौधा लगा देता है।  एक दिन नंदू को तेज़ बुखार आता है ।  पुष्पा एक माँ कि तरह उसका ध्यान रखती है और आनंद बाबू के साथ अच्छे डॉक्टर से नंदू का इलाज करवाती है।  dispensary में महेश बाबू को पता चलता है कि उसके बेटे की जान पुष्पा ने बचाई है तो वह उसे धन्यवाद देता है और अपनी पत्नी के लिए जो साड़ी खरीदी थी, एक भाई  कि तरफ से बहन को भाई दूज का उपहार देता है। भरे दिल से पुष्पा उस उपहार को स्वीकारती है। नंदू का परिवार अपने गांव वापस चले जाते है। 

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समय बदल गया, नंदू बड़ा होकर पटना से उसी शहर में तैनात एक सरकारी इंजीनियर बन जाता है। आनंद बाबू पुष्पा से मिलता है, जो अब एक नौकरानी है।  नंदू पुष्पा को ढूंढ़ने का प्रयास करता है और हारश्रिंगार का पेड़ देख खुश होता है और पास वाले घर में sparivar रहने लगता है। नंदू के बेटे की तबियत खराब हो जाती और वहीं डॉक्टर जिसने बचपन में उसका इलाज किया था aata hai aur dono ek dusre ko pehchan jate  है।  वहीं पुष्पा को उसका पति बीमार हालत में मिलता है और अगले दिन दम तोड़ देता है। आनंद बाबू अपने पुराने मित्रो से मिलते हुए डॉक्टर के पास आते है, जहाँ उसे पता चलता है की नंदू इसी शहर में है। अब आनंद बाबू ने शराब पीना छोड़ दिया है और अपनी पत्नी के पार्टी करने के तरीकों के कारण अलग हो गया है, लेकिन अंत में शांति से है और पुष्पा के प्यार और स्नेह से खुश है। वहीं नंदू डॉक्टर से मिलने आता है और आनंद बाबू  से भेंट हो जाती है।  आनंद बाबू नंदू को पुष्पा से मिलवाता है। पुष्पा की halaat और समाज द्वारा तिरस्कार देखने में दोनों असमर्थ होते है अंत में नंदू पुष्पा को अपनी माँ स्वीकार करते हुए दुर्गा पूजा के दिन घर लेकर जाता है। जाते जाते सबकी पलके भीग जाती और छलकते आँसू के साथ कहानी दुर्गा माँ की मूर्ति पे ख़तम होती है |

इस फिल्म ने बेस्ट स्क्रीनप्ले, डायलाग राइटर और साउंड रिकार्डिस्ट का फ़िल्म्फरे अवार्ड और राजेश खन्ना ने वेनिस फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट एक्टर का अवार्ड जीता. फिल्म आरडी बर्मन के संगीत के लिए विख्यात है जिसमें आवाज़ किशोर कुमार, एसडी बर्मन और लता मंगेशकर की थी | आनंद बख्शी द्वारा लिखित और किशोर कुमार द्वारा गाए गए गीतों और साउंडट्रैक को खूब सराहा गया, जिसमें ‘चिंगारी कोई भड़के’ साल के अंत में बिनाका गीतमाला की वार्षिक सूची 1972 में पांचवें स्थान पर रहा ।

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